मूल श्लोक
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
asaṃyatātmanā yogo duṣprāpa iti me matiḥ vaśyātmanā tu yatatā śakyo'vāptumupāyataḥ
अनुवाद
मेरे मत में, जिसका अंतःकरण काबू में नहीं उसको (इस साम्यबुद्धिरूप) योग का प्राप्त होना कठिन है; किन्तु अन्तःकरण को काबू में रखकर प्रयत्न करते रहने पर उपाय से (इस योग का) प्राप्त होना सम्भव है।
टिप्पणी
तात्पर्य, पहले जो बात कठिन देख पड़ती है, वही अभ्यास से और दीर्घ उद्योग से अन्त में सिद्ध हो जाती है। किसी भी काम को बारंबार करना 'अभ्यास' कहलाता है और 'वैराग्य' का मतलब है राग या प्रीति न रखना अर्थात् इच्छा-विहीनता। पातंजल-योगसूत्र में आरम्भ में ही योग का लक्षण यह बतलाया है कि 'योगश्चि त्तवृत्तिनिरोधः' – चित्तवृत्ति के निरोध को योग कहते है, कि 'अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः' – अभ्यास और वैराग्य से चित्तवृत्ति का निरोध हो जाता है। ये ही शब्द गीता में आए है और अभिप्राय यही है; परन्तु इतने ही से यह नहीं कहा जा सकता, कि गीता में ये शब्द पातंजलयोगसूत्र से लिए गए हैं (गीतार॰ पृ.53)। इस प्रकार, यदि मनोनिग्रह करके समाधि लगाना सम्भव हो, और कुछ निग्रही पुरुषों को छः महीने के अभ्यास से यदि यह सिद्धि प्राप्त हो सकती हो, तो अब यह दूसरी शंका होती है, कि प्रकृति-स्वभाव के कारण अनेक लोग दो-एक जन्मों में भी इस परमावस्था में नहीं पहुँच सकते – फिर ऐसे लोग इस सिद्धि को क्यों कर पावे? क्योंकि एक जन्म में, जितना हो सका उतना इन्द्रिय-निग्रह का अभ्यास कर कर्मयोग का आचरण करने लगें तो वह मरते समय अधूरा ही रह जाएगा और अगले जन्म में फिर पहले से आरम्भ करें तो फिर आगे के जन्म में भी वही हाल होगा। अतः अर्जुन का दूसरा प्रश्न है, कि इस प्रकार के पुरुष क्या करें –
— Lokmanya Tilak