मूल श्लोक
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yo māṃ paśyati sarvatra sarvaṃ ca mayi paśyati tasyāhaṃ na praṇaśyāmi sa ca me na praṇaśyati
अनुवाद
जो मुझको (परमेश्वर परमात्मा) सब स्थानों में और सब को मुझमें देखता है, उससे मैं कभी नहीं बिछुड़ता, और न वह ही मुझसे कभी दूर होता है।
टिप्पणी
इन श्लोकों में, पहला वर्णन 'आत्मा' शब्द का प्रयोग कर अव्यक्त अर्थात् आत्मदृष्टि से, और दूसरा वर्णन प्रथम पुरुष दर्शक 'मैं' पद के प्रयोग से व्यक्त अर्थात् भक्ति दृष्टि से किया गया है। परन्तु अर्थ दोनों का एक ही है गीतार॰ प्र॰ 13)। मोक्ष और कर्मयोग, इन दोनों का भी आधार यह ब्रह्मात्मैक्य दृष्टि ही है। 21 वें श्लोक का पहला अर्धांश कुछ फर्क के साथ मनुस्मृति (मनु॰ 12.91), महाभारत (शां॰ 238.21; 238.22) और उपनिषदों में भी (कैव. 1.10; ईश॰ 6) पाया जाता है। हमने गीतारहस्य के 12 वें प्रकरण में विस्तार सहित दिखलाया है कि सर्वभूतात्मैक्य-ज्ञान ही समग्र अध्यात्म और कर्मयोग का मूल है। यह ज्ञात हुए बिना इन्द्रियनिग्रह का सिद्ध हो जाना भी व्यर्थ है; इसलिए अगले अध्याय से परमेश्वर का ज्ञान बतलाना आरम्भ कर दिया है।
— Lokmanya Tilak