मूल श्लोक
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yaṃ saṃnyāsamiti prāhuryogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava na hyasaṃnyastasaṅkalpo yogī bhavati kaścana
अनुवाद
हे पांडव! जिसे संन्यास कहते है, उसी को (कर्म-) योग समझो। क्योंकि संकल्प अर्थात् काम्यबुद्धिरूप फलाशा का संन्यास ( = त्याग) किए बिना कोई भी (कर्म) योगी नहीं होता)।
टिप्पणी
पिछले अध्याय में जो कहा है कि 'एकं सांख्यं च योगं च' (5.5) या 'बिना योग के संन्यास नहीं होता' (5.6), अथवा 'ज्ञेयः स नित्य-संन्यासी' (5.3), उसी का यह अनुवाद है और आगे अठारहवें अध्याय (18.2) में समग्र विषय का उपसंहार करते हुए इसी अर्थ का फिर भी वर्णन किया है। गृहस्थाश्रम में अग्निहोत्र रखकर यज्ञ-याग आदि कर्म करने पड़ते है, पर जो संन्यासाश्रमी हो गया हो, उसके लिए मनुस्मृति में कहा गया है, कि उसको इस प्रकार अग्नि की रक्षा करने की कोई आवश्यकता नहीं रहती, इस कारण वह 'निरग्नि ' हो जाए और जंगल में रहकर भिक्षा से पेट पाले – जगत के व्यवहार में न पड़े (मनु॰ 6.25 इत्यादि)। पहले श्लोक में मनु के इसी मत का उल्लेख किया गया है और इस पर भगवान का कथन है कि निरग्नि और निष्क्रिय होना कुछ सच्चे संन्यास का लक्षण नहीं है। काम्यबुद्धि का या फलाशा का त्याग करना ही सच्चा संन्यास है। संन्यास बुद्धि में है; अग्नि -त्याग अथवा कर्म-त्याग की बाह्य क्रिया में नहीं है। अतएव फलाशा अथवा संकल्प का त्याग कर कर्तव्य-कर्म करनेवाले को ही सच्चा संन्यासी कहना चाहिए। गीता का यह सिद्धान्त स्मृतिकारों के सिद्धान्त से भिन्न है। गीतारहस्य के 11 वे प्रकरण (पृ. 346 – 249) में स्पष्ट कर दिखला दिया है, कि गीता ने स्मृतिकारों से इसका मेल कैसे किया है। इस प्रकार सच्चा संन्यास बतला कर अब यह बतलाते है, कि ज्ञान होने के पहले अर्थात् साधनावस्था में जो कर्म किए जाते है उनमें, और ज्ञानोत्तर अर्थात् सिद्धावस्था में फलाशा छोड़कर जो कर्म किए जाते है उनमें क्या भेद है।
— Lokmanya Tilak