मूल श्लोक
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
praśāntamanasaṃ hyenaṃ yoginaṃ sukhamuttamam upaiti śāntarajasaṃ brahmabhūtamakalmaṣam
अनुवाद
इस प्रकार शान्तचित्त, रज से रहित, निष्पाप और ब्रह्मभूत (कर्म-) योगी को उत्तम सुख प्राप्त होता है।