मूल श्लोक
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः ।सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yuñjannevaṃ sadā''tmānaṃ yogī vigatakalmaṣaḥ sukhena brahmasaṃsparśamatyantaṃ sukhamaśnute
अनुवाद
इस रीति से निरन्तर अपना योगाभ्यास करनेवाला (कर्म-) योगी पापों से छूट कर ब्रह्मसंयोग से प्राप्त होनेवाले अत्यन्त सुख का आनन्द से उपभोग करता है।
टिप्पणी
इन दो श्लोकों में हमने योगी का कर्मयोगी अर्थ किया है। क्योंकि कर्मयोग का साधन समझ कर ही पातंजल-योग का वर्णन किया गया है; अतः पातंजल-योग के अभ्यास करनेवाले उक्त पुरुष से कर्मयोगी ही विवक्षित है। तथापि योगी का अर्थ 'समाधि लगाए बैठा हुआ पुरुष' भी कर सकते है, किन्तु स्मरण रहे, कि गीता का प्रतिपाद्य मार्ग इससे भी परे है। यही नियम अगले दो-तीन श्लोकों को भी लागू है। इस प्रकार निर्वाण ब्रह्मसुख का अनुभव होने पर सब प्राणियों के विषय में जो आत्मौपम्य दृष्टि हो जाती है, अब उसका वर्णन करते है –
— Lokmanya Tilak