मूल श्लोक
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
taṃ vidyād duḥkhasaṃyogaviyogaṃ yogasaṃjñitam sa niścayena yoktavyo yogo'nirviṇṇacetasā
अनुवाद
उसको दुःख के स्पर्श से वियोग अर्थात् 'योग' नाम की स्थिति कहते है; और इस 'योग' का आचरण मन को उकताने न देकर निश्चय से करना चाहिए।
टिप्पणी
इन चारों श्लोकों में एक ही वाक्य है। 24 वें श्लोक के आरम्भ के उसको (तं) इस दर्शक सर्वनाम से पहले श्लोकों का वर्णन उद्दिष्ट है, और चारों श्लोकों में 'समाधि का यह लक्षण है कि 'योगश्चि त्तवृत्तिनिरोधः' – चित्त की वृत्ति के निरोध को योग कहते है। इसी के सदृश 20 वें श्लोक के आरम्भ के शब्द है। अब इस 'योग' शब्द का नया लक्षण जानबूझकर दिया है, कि समाधि इसी चित्तवृत्तिनिरोध की पूर्णावस्था है और इसी को 'योग' कहते है। उपनिषद् और महाभारत में कहा है, कि निग्रहकर्ता और उद्योगी पुरुष को सामान्य रीति से यह योग छः महीने में सिद्ध होता है (मैत्र्यु॰ 6,28; अमृतनाद॰ 29; मभा॰ अश्व॰ अनुगीता. 19.66)। किन्तु पहले 20 वें और 28 वें श्लोक में स्पष्ट कह दिया है कि पातंजल-योग की समाधि से प्राप्त होनेवाला सुख न केवल चित्त-निरोध से प्रत्युत चित्त-निरोध के द्वारा अपने आप आत्मा की पहचान कर लेने पर होता है। इस दुःख-रहित स्थिति को ही 'ब्रह्मानन्द' या 'आत्मप्रसादज सुख' अथवा 'आत्मानन्द' कहते है (गी॰ 18.37 और गीतार॰ पृ. 233 देखो)। अगले अध्यायों में इसका वर्णन है, कि आत्मज्ञान होने के लिए आवश्यक चित्त की यह समता एक पातंजल-योग से ही नहीं उत्पन्न होती, किन्तु चित्तशुद्धि का यह परिणाम ज्ञान और भक्ति से भी हो जाता है। यही मार्ग अधिक प्रशस्त और सुलभ समझा जाता है। समाधि का लक्षण बतला चुके; अब बतलाते है कि उसे किस प्रकार लगाना चाहिए –
— Lokmanya Tilak