मूल श्लोक
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणाऽपि विचाल्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yaṃ labdhvā cāparaṃ lābhaṃ manyate nādhikaṃ tataḥ yasminsthito na duḥkhena guruṇā'pi vicālyate
अनुवाद
ऐसे ही जिस स्थिति को पाने से उसकी अपेक्षा दूसरा कोई भी लाभ उसे अधिक नहीं जँचता, और जहाँ स्थिर होने से कोई बड़ा भारी दुःख (उसको) वहाँ से बिचला नहीं सकता,