मूल श्लोक
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।वेत्ति यत्र न चैवाऽयं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sukhamātyantikaṃ yattad buddhigrāhyamatīndriyam vetti yatra na caivā'yaṃ sthitaścalati tattvataḥ
अनुवाद
जहाँ (केवल) बुद्धिगम्य और इन्द्रियों को अगोचर अत्यन्त सुख का उसे अनुभव होता है और जहाँ वह (एक बार) स्थिर हुआ तो तत्त्व से कभी नहीं डिगता।