मूल श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
śrībhagavānuvāca anāśritaḥ karmaphalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ sa saṃnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ
अनुवाद
कर्मफल का आश्रय न करके (अर्थात् मन में फलाशा को न टिकने दे कर) जो (शास्त्रानुसार अपने विहित) कर्तव्य-कर्म करता है, वहीं संन्यासी और वही कर्मयोगी है। निरग्नि अर्थात् अग्निहोत्र आदि कर्मों को छोड़ देनेवाला अथवा अक्रिय कोई भी कर्म न करके निठल्ले बैठने वाला (सच्चा संन्यासी और योगी) नहीं है।