भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.१४ ·

English

मूल श्लोक

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

praśāntātmā vigatabhīrbrahmacārivrate sthitaḥ manaḥ saṃyamya maccitto yukta āsīta matparaḥ

६.१४अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक १४

अनुवाद

निडर हो, शान्त अन्तःकरण से ब्रह्मचर्य-व्रत का पाल कर तथा मन का संयम करके, मुझ में ही चित्त लगा कर, मत्परायण होता हुआ युक्त हो जाएँ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

'शुद्ध स्थान में' और 'शरीर, ग्रीवा एवं शिर को सम कर' ये शब्द श्वेताश्वतर उपनिषद् के हैं (श्वे॰ 2.8 और 10 देखो); और ऊपर का समूचा वर्णन भी हठयोग का नहीं है, प्रस्तुत पुराने उपनिषदों में जो योग का वर्णन है, उससे अधिक मिलता-जुलता है। हठयोग में इन्द्रियों का निग्रह बलात्कार से किया जाता है; पर आगे इसी अध्याय के 28 वें श्लोक में कहा है, कि ऐसा न करके 'मनसैव इन्द्रियग्रामं विनियम्य' – मन से ही इन्द्रियों को रोके। इससे प्रगट है कि गीता में हठयोग विवक्षित नहीं। ऐसे ही इस अध्याय के अन्त में कहा है, कि इस वर्णन का यह उद्देश्य नहीं, कि कोई अपना सारी जिन्दगी योगाभ्यास में ही बिता दे। अब इस योगाभ्यास के फल का अधिक निरूपण करते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.१४