मूल श्लोक
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः ।शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yuñjannevaṃ sadā''tmānaṃ yogī niyatamānasaḥ śāntiṃ nirvāṇaparamāṃ matsaṃsthāmadhigacchati
अनुवाद
इस प्रकार सदा अपना योगाभ्यास जारी रखने से मन काबू में होकर (कर्म-) योगी को मुझमें रहने वाली और अन्त में निर्वाण-पद अर्थात् मेरे स्वरूप में लीन कर देने वाली शान्ति प्राप्त होती है।
टिप्पणी
इस श्लोक में 'सदा' पद से प्रतिदिन के 24 घंटों का मतलब नहीं! इतना ही अर्थ विवक्षित है, कि प्रतिदिन यथाशक्ति घड़ी-घड़ी भर यह अभ्यास करें (श्लोक 10 की टिप्पणी देखो)। कहा है, कि इस प्रकार योगाभ्यास करता हुआ 'मच्चित्त' और 'मत्परायण' हो। इसका कारण यह है, कि पातंजल-योग मन के निरोध करने की एक युक्ति या क्रिया है; इस कसरत से यदि मन स्वाधीन हो गया तो वह एकाग्र मन भगवान में न लगा कर और दूसरी बात की ओर भी लगाया जा सकता है। पर गीता का कथन है, कि चित्त की एकाग्रता का ऐसा दुरुपयोग न कर, इस एकाग्रता या समाधि का उपयोग परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने में होना चाहिए, और ऐसा होने से ही यह योग सुखकारक होता है; अन्यथा ये निरे क्लेश है। यही अर्थ आगे 29 वें, 30 वें एवं अध्याय के अन्त में 46 वें श्लोक में आया है। परमेश्वर में निष्ठा न रख जो लोग केवल इन्द्रिय-निग्रह का योग, या इन्द्रियों की कसरत करते है, वे लोगों को क्लेशप्रद जारण, मारण या वशीकरण वगैरह कर्म करने में ही प्रवीण हो जाते है। यह अवस्था न केवल गीता को ही, प्रत्युत किसी भी मोक्षमार्ग को इष्ट नहीं। अब फिर इसी योग-क्रिया का अधिक खुलासा करते है –
— Lokmanya Tilak