भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.१५ ·

English

मूल श्लोक

युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः ।शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yuñjannevaṃ sadā''tmānaṃ yogī niyatamānasaḥ śāntiṃ nirvāṇaparamāṃ matsaṃsthāmadhigacchati

६.१५अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक १५

अनुवाद

इस प्रकार सदा अपना योगाभ्यास जारी रखने से मन काबू में होकर (कर्म-) योगी को मुझमें रहने वाली और अन्त में निर्वाण-पद अर्थात् मेरे स्वरूप में लीन कर देने वाली शान्ति प्राप्त होती है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक में 'सदा' पद से प्रतिदिन के 24 घंटों का मतलब नहीं! इतना ही अर्थ विवक्षित है, कि प्रतिदिन यथाशक्ति घड़ी-घड़ी भर यह अभ्यास करें (श्लोक 10 की टिप्पणी देखो)। कहा है, कि इस प्रकार योगाभ्यास करता हुआ 'मच्चित्त' और 'मत्परायण' हो। इसका कारण यह है, कि पातंजल-योग मन के निरोध करने की एक युक्ति या क्रिया है; इस कसरत से यदि मन स्वाधीन हो गया तो वह एकाग्र मन भगवान में न लगा कर और दूसरी बात की ओर भी लगाया जा सकता है। पर गीता का कथन है, कि चित्त की एकाग्रता का ऐसा दुरुपयोग न कर, इस एकाग्रता या समाधि का उपयोग परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने में होना चाहिए, और ऐसा होने से ही यह योग सुखकारक होता है; अन्यथा ये निरे क्लेश है। यही अर्थ आगे 29 वें, 30 वें एवं अध्याय के अन्त में 46 वें श्लोक में आया है। परमेश्वर में निष्ठा न रख जो लोग केवल इन्द्रिय-निग्रह का योग, या इन्द्रियों की कसरत करते है, वे लोगों को क्लेशप्रद जारण, मारण या वशीकरण वगैरह कर्म करने में ही प्रवीण हो जाते है। यह अवस्था न केवल गीता को ही, प्रत्युत किसी भी मोक्षमार्ग को इष्ट नहीं। अब फिर इसी योग-क्रिया का अधिक खुलासा करते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.१५