मूल श्लोक
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sparśānkṛtvā bahirbāhyāṃścakṣuścaivāntare bhruvoḥ prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantaracāriṇau
अनुवाद
बाह्यपदार्थों के (इन्द्रियों के सुख-दुःखदायक) संयोग से अलग होकर, दोनों भौंहों के बीच में दृष्टि को जमाकर और नाक से चलने वाले प्राण एवं अपान को सम करके,