मूल श्लोक
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yatendriyamanobuddhirmunirmokṣaparāyaṇaḥ vigatecchābhayakrodho yaḥ sadā mukta eva saḥ
अनुवाद
जिसने इन्द्रिय, मन और बुद्धि का संयम कर लिया है, तथा जिसके भय, इच्छा और क्रोध छूट गए है, वह मोक्षपरायण मुनि सदा-सर्वदा मुक्त ही है।
टिप्पणी
गीतारहस्य के नवम (पृ. 233, 246) और दशम (पृ. 299) प्रकरणों से ज्ञात होगा कि यह वर्णन जीवन्मुक्तावस्था का है। परन्तु हमारी राय में टीकाकारों का यह कथन ठीक नहीं है, कि यह वर्णन संन्यासमार्ग के पुरुष का है। संन्यास और कर्मयोग, दोनों मार्गों में शान्ति तो एक ही सी रहती है, और उतने ही के लिए यह वर्णन संन्यासमार्ग को उपयुक्त हो सकेगा। परन्तु इस अध्याय के आरम्भ के कर्मयोग को श्रेष्ठ निश्चित कर फिर 25 वें श्लोक में जो यह कहा है, कि ज्ञानी पुरुष सब प्राणियों का हित करने में प्रत्यक्ष मग्न रहते है, इससे प्रगट होता है कि यह समस्त वर्णन कर्मयोगी जीवन्मुक्त का ही है – संन्यासी का नहीं है (गीतार॰ पृ. 373 देखो)। कर्म-मार्ग में भी सर्व-भूतान्तर्गत परमेश्वर को पहचानना ही परम साध्य है, अतः भगवान अन्त में कहते हैं कि –
— Lokmanya Tilak