भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ५.१९ ·

English

मूल श्लोक

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

ihaiva tairjitaḥ sargo yeṣāṃ sāmye sthitaṃ manaḥ nirdoṣaṃ hi samaṃ brahma tasmādbrahmaṇi te sthitāḥ

५.१९अध्याय ५ · संन्यासयोग२९ में से श्लोक १९

अनुवाद

इस प्रकार जिनका मन साम्यावस्था में स्थिर हो जाता है, वे यहीं के यहीं अर्थात् मरण की प्रतीक्षा न कर, मृत्युलोक को जीत लेते है। क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, अतः ये (साम्य-बुद्धिवाले) पुरुष (सदैव) ब्रह्म में स्थित अर्थात् यहीं के यहीं ब्रह्मभूत हो जाते है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

जिसने इस तत्त्व को जान लिया कि 'आत्मस्वरूपी परमेश्वर अकर्ता है आर सारा खेल प्रकृति का है,' वह 'ब्रह्मसंस्थ' हो जाता है और उसी को मोक्ष मिलता है - 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' (छां॰ 2.23.1); उक्त वर्णन उपनिषदों में है और उसी का अनुवाद ऊपर के श्लोकों में किया गया है। परन्तु इस अध्याय के 1 – 12 श्लोकों से गीता का यह अभिप्राय प्रगट होता है, कि इस अवस्था में भी कर्म नहीं छूटते। शंकराचार्य ने छान्दोग्य उपनिषद् के उक्त वाक्य का संन्यासप्रधान अर्थ किया है। परन्तु मूल उपनिषद् का पूर्वापर सन्दर्भ देखने से विदित होता है, कि 'ब्रह्मसंस्थ' होने पर भी तीन आश्रमों के कर्म करनेवाले के विषय में भी यह वाक्य कहा गया होगा और इस उपनिषद् के अन्त में यहीं अर्थ स्पष्ट रूप से बतलाया गया है (छां॰ 8.15.1 देखो)। ब्रह्मज्ञान हो चुकने पर यह अवस्था जीते जी प्राप्त हो जाती है, अतः इसे ही जीवन्मुक्तावस्था कहते है (गीतार॰ पृ. 298 – 300 देखो)। अध्यात्मविद्या की यही पराकाष्ठा है। चित्तवृत्ति-निरोधरूपी जिन योग-साधनों से यह अवस्था प्राप्त हो सकती है, उनका विस्तारपूर्वक वर्णन अगले अध्याय में किया गया है। इस अध्याय में अब केवल इसी अवस्था का अधिक वर्णन है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ५, श्लोक ५.१९