मूल श्लोक
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
ajo'pi sannavyayātmā bhūtānāmīśvaro'pi san prakṛtiṃ svāmadhiṣṭhāya sambhavāmyātmamāyayā
अनुवाद
मैं (सब) प्राणियों का स्वामी और जन्म-विरहित हूँ; यद्यपि मेरे आत्मा-स्वरूप में कभी भी व्यय अर्थात् विकार नहीं होता तथापि अपनी ही प्रकृति में अधिष्ठित होकर मैं अपनी माया से जन्म लिया करता हूँ।
टिप्पणी
इस श्लोक के अध्यात्मज्ञान में कापिल-सांख्य और वेदान्त दोनों ही मतों का मेल कर दिया है। सांख्यमत-वालों का कथन है कि प्रकृति आप ही स्वयं सृष्टि का निर्माण करती है; परन्तु वेदान्ती लोग प्रकृति को परमेश्वर का ही एक स्वरूप समझकर यह मानते है कि प्रकृति में परमेश्वर के अधिष्ठित होने पर प्रकृति से व्यक्त सृष्टि निर्मित होती है। अपने अव्यक्त स्वरूप से सारे जगत को निर्माण करने की परमेश्वर की इस अचिन्त्य शक्ति को ही गीता में 'माया' कहा है। और इसी प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी ऐसा वर्णन है - 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्' अर्थात् प्रकृति ही माया है और उस माया का अधिपति परमेश्वर है (श्वे॰ 4.10) और 'अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्' – इससे माया का अधिपति सृष्टि उत्पन्न करता है (श्वे॰ 4.9)। प्रकृति को माया क्यों कहते है, इस माया का स्वरूप क्या है, और इस कथन का क्या अर्थ कि माया से सृष्टि उत्पन्न होती है? – इत्यादि प्रश्नों का अधिक विवरण गीतारहस्य के 9 वें प्रकरण में किया गया है। यह बतला दिया कि अव्यक्त परमेश्वर व्यक्त कैसे होता है अर्थात् कर्म उपजा हुआ-सा कैसे देख पड़ता है; अब इस बात का खुलासा करते है, कि यह ऐसा कब और किस लिए करता है –
— Lokmanya Tilak