भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ४.४२ ·

English

मूल श्लोक

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः ।छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

tasmādajñānasambhūtaṃ hṛtsthaṃ jñānāsinā''tmanaḥ chittvainaṃ saṃśayaṃ yogamātiṣṭhottiṣṭha bhārata

४.४२अध्याय ४ · ज्ञानविभागयोग४२ में से श्लोक ४२

अनुवाद

इसलिए अपने हृदय में अज्ञान से उत्पन्न हुए इस संशय को ज्ञानरूप तलवार से काट कर, (कर्म-) योग का आश्रय कर। (और) हे भारत! (युद्ध के लिए) खड़ा हो।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

ईशावास्य उपनिषद् में 'विद्या' और 'अविद्या' का पृथक उपयोग दिखलाकर जिस प्रकार दोनों को बिना छोड़े ही आचरण करने के लिए कहा गया है (ईश॰ 11; गीतार॰ पृ. 356 देखो); उसी प्रकार गीता के इन दो श्लोकों में ज्ञान और (कर्म-) योग का पृथक उपयोग दिखलाकर उनके अर्थात् ज्ञान और योग के समुच्चय से ही कर्म करने के विषय में अर्जुन को उपदेश दिया गया है। इन दोनों का पृथक-पृथक उपयोग यह है कि निष्काम बुद्धियोग के द्वारा कर्म करने पर उनके बन्धन टूट जाते है और वे मोक्ष के लिए प्रतिबन्धक नहीं होते एवं ज्ञान से मन का सन्देह दूर होकर मोक्ष मिलता है। अतः अन्तिम उपदेश यह है कि अकेले कर्म या अकेले ज्ञान को स्वीकार न करो, किन्तु ज्ञानकर्म-समुच्चयात्मक कर्मयोग का आश्रय करके युद्ध करो। अर्जुन को योग का आश्रय करके युद्ध के लिए खड़ा रहना था, इस कारण गीतारहस्य के पृष्ठ 58 में दिखलाया गया है, कि योग शब्द का अर्थ यहाँ 'कर्मयोग' ही लेना चाहिए। ज्ञान और योग का यह मेल ही 'ज्ञानयोगव्यवस्थि तिः' पद से दैवी सम्पत्ति के लक्षण (गी॰ 16.1) में फिर बतलाया गया है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ४, श्लोक ४.४२