मूल श्लोक
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yogasaṃnyastakarmāṇaṃ jñānasañchinnasaṃśayam ātmavantaṃ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya
अनुवाद
हे धनंजय! उस आत्मज्ञानी पुरुष को कर्म बद्ध नहीं कर सकते, कि जिसने (कर्म-) योग के आश्रय से कर्म अर्थात् कर्मबन्धन त्याग दिए हैं और ज्ञान से जिसके (सब) सन्देह दूर हो गए हैं।