मूल श्लोक
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
ajñaścāśraddadhānaśca saṃśayātmā vinaśyati nāyaṃ loko'sti na paro na sukhaṃ saṃśayātmanaḥ
अनुवाद
परन्तु जिसे न स्वयं ज्ञान है और न श्रद्धा ही है, उस संशयग्रस्त मनुष्य का नाश हो जाता है। संशयग्रस्त को न यह लोक है (और) न परलोक, एवं सुख भी नहीं है।
टिप्पणी
ज्ञानप्राप्ति के ये दो मार्ग बतला चुके है, एक बुद्धि का और दूसरा श्रद्धा का। अब ज्ञान और कर्मयोग का पृथक उपयोग दिखला कर समस्त विषय का उपसंहार करते हैं –
— Lokmanya Tilak