भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ४.३३ ·

English

मूल श्लोक

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

śreyāndravyamayādyajñājjñānayajñaḥ parantapa sarvaṃ karmākhilaṃ pārtha jñāne parisamāpyate

४.३३अध्याय ४ · ज्ञानविभागयोग४२ में से श्लोक ३३

अनुवाद

हे परन्तप! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ है। क्योंकि हे पार्थ! सब प्रकार के समस्त कर्मों का पर्यवसान ज्ञान में होता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

गीता में 'ज्ञानमय' शब्द दो बार आगे भी आया है (गी॰ 9.15 और 18.70)। हम जो द्रव्यमय यज्ञ करते है, वह परमेश्वर की प्राप्ति के लिए किया करते है। परन्तु परमेश्वर की प्राप्ति उसके स्वरूप का ज्ञान हुए बिना नहीं होती। अतएव परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर, उस ज्ञान के अनुसार आचरण करके परमेश्वर की प्राप्ति कर लेने से इस मार्ग या साधन 'ज्ञानयज्ञ' कहते है। यह यज्ञ मानस और बुद्धिसाध्य है, अतः द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा इसकी योग्य अधिक समझी जाती है। मोक्षशास्त्र में ज्ञानमय का यह ज्ञान ही मुख्य है और इस ज्ञान से सब कर्मों का क्षय हो जाता है। कुछ भी हो, गीता का यह स्थिर सिद्धान्त है, कि अन्त में परमेश्वर का ज्ञान होना चाहिए। बिना ज्ञान के मोक्ष नहीं मिलता। तथापि 'कर्म का पर्यवसान ज्ञान में होता है' इस वचन का यह अर्थ नहीं है कि ज्ञान के पश्चात् कर्मों को छोड़ देना चाहिए – यह बात गीतारहस्य के दसवें और ग्यारहवें प्रकरण में विस्तारपूर्वक प्रतिपादन की गई है। अपने लिए नहीं, तो लोकसंग्रह के निमित्त कर्तव्य समस्त कर सभी कर्म करना ही चाहिए; और जब कि वे ज्ञान एवं समबुद्धि से किए जाते है, तब उनके पाप-पुण्य की बाधा कर्ता को नहीं होती (देखो आगे 37 वाँ श्लोक) और यह ज्ञानयज्ञ मोक्षप्रद होता है। अतः गीता का सब लोगों को यही उपदेश है कि यज्ञ करो, किन्तु उन्हें ज्ञानपूर्वक निष्काम बुद्धि से करो।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ४, श्लोक ४.३३