भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ४.३२ ·

English

मूल श्लोक

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

evaṃ bahuvidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhe karmajānviddhi tānsarvānevaṃ jñātvā vimokṣyase

४.३२अध्याय ४ · ज्ञानविभागयोग४२ में से श्लोक ३२

अनुवाद

इस प्रकार भाँति-भाँति के यज्ञ ब्रह्म के (ही) मुख में जारी है। यह जानो कि वे सब कर्म से निष्फल होते हैं। यह ज्ञान हो जाने से तू मुक्त हो जाएगा।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

ज्योतिष्टोम आदि द्रव्यमय श्रौतयज्ञ अग्नि में हवन करके किए जाते हैं और शास्त्र में कहा गया है कि देवताओं के मुख अग्नि है; इस कारण ये यज्ञ उन देवताओं को मिल जाते है। परन्तु यदि कोई शंका करें कि देवताओं के मुख – अग्नि – में उक्त लाक्षणिक यज्ञ नहीं होते, अतः इस लाक्षणिक यज्ञों से श्रेय-प्राप्ति होगी कैसे? तो उसे दूर करने के लिए कहा गया है, कि ये यज्ञ साक्षात् ब्रह्म के ही मुख होते है। दूसरे चरण का भावार्थ यह है कि जिस पुरुष ने यज्ञविधि के इस व्यापक स्वरूप को – केवल मीमांसकों के संकुचित अर्थ को ही नहीं – जान लिया, उसकी बुद्धि संकुचित नहीं रहती, किन्तु वह ब्रह्म के स्वरूप को पहचानने का अधिकारी हो जाता है। अब बतलाते है कि इन सब यज्ञों में श्रेष्ठ कौन है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ४, श्लोक ४.३२