मूल श्लोक
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yajñaśiṣṭāmṛtabhujo yānti brahma sanātanam nāyaṃ loko'styayajñasya kuto'nyaḥ kurusattama
अनुवाद
(4.30–31) और कुछ लोग आहार को नियमित कर, प्राणों में प्राणों का ही होम किया करते हैं। ये सभी लोग सनातन ब्रह्म में जा मिलते हैं कि जो यज्ञ के जानने-वाले है, जिनके पाप यज्ञ से क्षीण हो गए है (और जो) अमृत का (अर्थात् यज्ञ से बचे हुए का) उपभोग करनेवाले है; यज्ञ न करनेवाले को (जब) इस लोक में सफलता नहीं होती, (तब) फिर हे कुरुश्रेष्ठ! (उसे) परलोक कहाँ से (मिलेगा)?
टिप्पणी
सारांश, यज्ञ करना यद्यपि वेद की आज्ञा के अनुसार मनुष्य का कर्तव्य है, तो भी यह यज्ञ एक ही प्रकार का नहीं होता। प्राणायाम करो, तप करो, वेद का अध्ययन करो, अग्निष्टोम करो, पशु-यज्ञ करो, तिल-चावल अथवा घी का हवन करो, पूजा-पाठ करो, या नैवेद्य-वैश्वदेव आदि पाँच गृहयज्ञ करो; फलासक्ति के छूट जाने पर ये सब व्यापक अर्थ में यज्ञ ही है; और फिर यज्ञ-शेष भक्षण के विषय में मीमांसकों के जो सिद्धान्त हैं, वे सब इनमें से प्रत्येक यज्ञ के लिए उपयुक्त हो जाते है; इनमें से पहला नियम यह है कि 'यज्ञ के अर्थ किया हुआ कर्म बन्धक नहीं होता' और इसका वर्णन तेईसवें श्लोक में हो चुका है (गी॰ 3.9 पर टिप्पणी देखो)। अब दूसरा नियम यह है कि प्रत्येक गृहस्थ पंचमहायज्ञ कर अतिथि आदि के भोजन कर चुकने पर फिर अपनी पत्नी सहित भोजन करें और इस प्रकार बर्तने से गृहस्थाश्रम सफल होकर सद्गति देता है। 'विघसं भुक्तशेषं तु यज्ञशेषमथामृतम्' (मनु॰ 3.285) – अतिथि वगैरह के भोजन कर चुकने पर जो बचे उसे 'विघस' और यज्ञ करने में जो शेष रहे, उसे 'अमृत' कहते है; इस प्रकार व्याख्या करके मनुस्मृति और अन्य स्मृतियों में भी कहा है, कि प्रत्येक गृहस्थ को नित्य विघसाशी और अमृताशी होना चाहिए (गी॰ 3.13 और गीतारहस्य पृ.191 देखो)। अब भगवान कहते है, कि सामान्य गृहस्थ को उपयुक्त होनेवाला यह सिद्धान्त ही सब प्रकार के उक्त यज्ञों को उपयोगी होता है। यज्ञ के अर्थ किया हुआ कोई भी कर्म बन्धक नहीं होता, यही नहीं बल्कि उन कर्मों में से अवशिष्ट काम यदि अपने निजी उपयोग में आ जावें, तो भी वे बन्धक नहीं होते (देखो गीतार॰ पृ. 384)। 'बिना यज्ञ के इहलोक भी सिद्ध नहीं होता' यह वाक्य मार्मिक और महत्त्व का है। इसका अर्थ उतना ही नहीं है, कि यज्ञ के बिना पानी नहीं बरसता और पानी के न बरसने से इस लोक की गुजर नहीं होती; किन्तु 'यज्ञ' शब्द का व्यापक अर्थ लेकर, इस सामाजिक तत्त्व का भी इसमें पर्याय से समावेश हुआ है, कि कुछ अपनी प्यारी बातों को छोड़े बिना न तो सब को एक-सी सुविधा मिल सकती है, और न जगत के व्यवहार ही चल सकते हैं। उदाहरणार्थ – पश्चिमी समाजशास्त्र-प्रणेता जो यह सिद्धान्त बतलाते है, कि अपनी-अपनी स्वतन्त्रता को परिमित किए बिना औरों को एक-सी स्वतन्त्रता नहीं मिल सकती, वह इस तत्त्व का एक उदाहरण है। और, यदि गीता की परिभाषा से इसी अर्थ को कहना हो, जो इस स्थल पर ऐसी यज्ञप्रधान भाषा का ही प्रयोग करना पड़ेगा. कि 'जब तक प्रत्येक मनुष्य अपनी स्वतन्त्रता के कुछ अंश का भी यज्ञ न करें, तब तक इस लोक के व्यवहार चल नहीं सकते।' इस प्रकार के व्यापक और विस्तृत अर्थ से जब यह निश्चय हो चुका, कि यज्ञ ही सारी समाजरचना का आधार है, तब कहना नहीं होगा, केवल कर्तव्य की दृष्टि से 'यज्ञ' करना जब तक प्रत्येक मनुष्य न सीखेगा, तब तक समाज की व्यवस्था ठीक न रहेगी।
— Lokmanya Tilak