मूल श्लोक
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वाऽपि न निबद्ध्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yadṛcchālābhasantuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ samaḥ siddhāvasiddhau ca kṛtvā'pi na nibaddhyate
अनुवाद
यदृच्छा से जो प्राप्त हो जाएँ उसमें सन्तुष्ट, (हर्ष-शोक आदि) द्वन्द्वों से मुक्त निर्मत्सर, और (कर्म की) सिद्धि या असिद्धि को एक-सा ही मानने वाला पुरुष (कर्म) करके भी (उनके पाप-पुण्य से) बद्ध नहीं होता।