मूल श्लोक
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
nirāśīryatacittātmā tyaktasarvaparigrahaḥ śārīraṃ kevalaṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam
अनुवाद
आशीः अर्थात् फल की वासना छोड़ने वाला, चित्त का नियमन करनेवाला और सर्वसंग से मुक्त पुरुष केवल शारीर अर्थात् शरीर या कर्मेन्द्रियों से ही कर्म करते समय पाप का भागी नहीं होता।
टिप्पणी
कुछ लोग बीसवें श्लोक के निराश्रय शब्द का अर्थ 'घर-गृहस्थी न रखने वाला' संन्यासी करते है; पर वह ठीक नहीं है। आश्रय को घर या डेरा कह सकेंगे, परन्तु इस स्थान पर कर्ता के स्वयं रहने का ठिकाना विवक्षित नहीं है। अर्थ यह है, कि वह जो कर्म करता है उसका हेतुरूप ठिकाना (आश्रय) कहीं न रहे। यही अर्थ गीता के 6.1 श्लोक में 'अनाश्रितः कर्मफलं' इन शब्दों में स्पष्ट व्यक्त किया गया है, और वामन पण्डित ने गीता की यथार्थ-दीपिका नामक अपनी मराठी टीका में इसे स्वीकार किया है। ऐसे ही 21 वें श्लोक में 'शारीर' के मानी सिर्फ शरीर-पोषण के लिए भिक्षाटन आदि कर्म नहीं है। आगे पाँचवें अध्याय में 'योगी अर्थात् कर्मयोगी लोग आसक्ति अथवा काम्यबुद्धि को मन में रखकर केवल इन्द्रियों से कर्म किया करते है' (5.11) ऐसा जो वर्णन है, उसके समानार्थक ही 'केवल शारीरं कर्म' इन पदों का सच्चा अर्थ है। इन्द्रियाँ कर्म करती है, पर बुद्धि सम रहने के कारण उन कर्मों का पाप-पुण्य कर्ता को नहीं लगता।
— Lokmanya Tilak