मूल श्लोक
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
gatasaṅgasya muktasya jñānāvasthitacetasaḥ yajñāyācarataḥ karma samagraṃ pravilīyate
अनुवाद
आसंगरहित, (राग-द्वेष से) मुक्त, (साम्यबुद्धिरूप) ज्ञान में स्थि रचित्त वाले और (केवल) यज्ञ ही के लिए (कर्म) करनेवाले पुरुष के समग्र विलीन हो जाते है।
टिप्पणी
तीसरे अध्याय (3.9) में जो यह भाव है कि मीमांसकों के मत में यज्ञ के लिए किए हुए कर्म बन्धक नहीं होते और आसक्ति छोड़कर करने से वे ही कर्म स्वर्गप्रद न होकर मोक्षप्रद होते है, वह इस श्लोक में बतलाया गया है। 'समग्र विलीन हो जाते है,' में 'समग्र' पद महत्त्व का है। मीमांसकों लोक स्वर्गसुख को ही परमसाध्य मानते है, और उनकी दृष्टि से स्वर्गसुख को प्राप्त कर देनेवाले कर्म बन्धक नहीं होते। परन्तु गीता की दृष्टि स्वर्ग से परे, अर्थात् मोक्ष पर है, और इस दृष्टि से स्वर्गप्रद कर्म भी बन्धक ही होते है। अतएव कहा है, कि यज्ञार्थ कर्म भी अनासक्त बुद्धि से करने पर 'समग्र' लय पाते हैं अर्थात् स्वर्गप्रद न होकर मोक्षप्रद हो जाते है। तथापि इस अध्याय में यत्र-प्रकरण के प्रतिपादन में और तीसरे अध्याय वाले यज्ञ-प्रकरण के प्रतिपादन में एक बड़ा भारी भेद है। तीसरे अध्याय में कहा है, कि श्रौत-स्मार्त अनादि यज्ञ-चक्र को स्थिर रखना चाहिए। परन्तु अब भगवान कहते है कि यज्ञ का इतना ही संकुचित अर्थ न समझो, कि देवता के उद्देश्य से अग्नि में तिल-चावल या पशु का हवन कर दिया जावें, अर्थात् चातुर्वर्ण्य के कर्म स्वधर्म के अनुसार काम्य बुद्धि से किए जावें। अग्नि मे आहुति छोड़ते समय अन्त में 'इदं न मम' – यह मेरा नहीं – इस शब्दों का उच्चारण किया जाता है; इनमें स्वार्थत्यागरूप निर्मत्व का जो तत्त्व है, वही यज्ञ में प्रधान भाग है। इस रीति से 'न मम' कहकर अर्थात् ममतायुक्त बुद्धि छोड़कर, ब्रह्मार्पणपूर्वक जीवन के समस्त व्यवहार करना भी एक बड़ा यज्ञ या होम ही हो जाता है। सारांश, मीमांसकों के द्रव्ययज्ञसम्बन्धी जो सिद्धान्त है, वे इस बड़े यज्ञ के लिए भी उपयुक्त होते है; और लोकसंग्रह के निमित्त जगत के आसक्ति -विरहित कर्म करनेवाला पुरुष कर्म के 'समग्र' फल से मुक्त होता हुआ अन्त में मोक्ष पाता है (गीतार॰ पृ. 344 – 347 देखो)। ब्रह्मार्पणरूपी बड़े यज्ञ का ही वर्णन पहले श्लोक में किया गया है और फिर इसकी अपेक्षा कम योग्यता के अनेक लाक्षणिक यज्ञों का स्वरूप बतलाया गया है; एवं तैंतीसवें श्लोक में समग्र प्रकरण का उपसंहार कर कहा गया है कि ऐसा 'ज्ञानयज्ञ ही सब में श्रेष्ठ है।'
— Lokmanya Tilak