मूल श्लोक
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
tyaktvā karmaphalāsaṅgaṃ nityatṛpto nirāśrayaḥ karmaṇyabhipravṛtto'pi naiva kiñcitkaroti saḥ
अनुवाद
कर्मफल की आसक्ति छोड़कर जो सदा तृप्त और निराश्रय है (अर्थात् जो पुरुष कर्मफल के साधन की आश्रयभूत ऐसी बुद्धि नहीं रखता, कि अमुक कार्य की सिद्धि के लिए अमुक काम करता हूँ) – कहना चाहिए कि – वह कर्म करने में निमग्न रहने पर भी कुछ नहीं करता।