भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ४.१८ ·

English

मूल श्लोक

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

karmaṇyakarma yaḥ paśyedakarmaṇi ca karma yaḥ sa buddhimānmanuṣyeṣu sa yuktaḥ kṛtsnakarmakṛt

४.१८अध्याय ४ · ज्ञानविभागयोग४२ में से श्लोक १८

अनुवाद

कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म जिसे देख पड़ता है, वह पुरुष सब मनुष्यों में ज्ञानी और वही युक्त अर्थात् योगयुक्त एवं समस्त कर्म करनेवाला है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इसमें और अगले पाँच श्लोकों में कर्म, अकर्म एवं विकर्म का खुलासा किया गया है; इसमें जो कुछ कमी रह गई है, वह अगले अठारहवें अध्याय में कर्मत्याग, कर्म तथा कर्ता के विविध भेद-वर्णन में पूरा कर दिया है (गी॰ 18.4 – 7; 18.23 – 25; 18 – 66 – 28)। यहाँ संक्षेप में स्पष्टतापूर्वक यह बतला देना आवश्यक है, कि दोनों स्थलों के कर्म-विवेचन से कर्म, अकर्म और विकर्म के सम्बन्ध में गीता के सिद्धान्त क्या हैं; क्योंकि टीकाकारों ने इस सम्बन्ध में बड़ी गड़बड़ी कर दी है। संन्यासमार्ग-वालों को सब कर्मों का स्वरूपतः त्याग इष्ट है, इसलिए वे गीता के 'अकर्म' पद का अर्थ खींचातानी से अपने मार्ग की ओर लाना चाहते है; मीमांसकों को यज्ञयाग आदि काम्य कर्म इष्ट है, इसलिए उनके अतिरिक्त और सभी कर्म उन्हें 'विकर्म' जँचते है। इसके सिवा मीमांसकों के नित्यनैमित्तिक आदि कर्मभेद भी उसी में आ जाते हैं; और फिर धर्मशास्त्री उसी में अपनी ढाई चावल की खिचड़ी पकाने की इच्छा रखते है। सारांश, चारों ओर से ऐसी खींचातानी होने के कारण, अन्त में यह जान लेना कठिन हो जाता है, कि गीता 'अकर्म' किसे कहती है और 'विकर्म' किसे? अतएव पहले से ही इस बात पर ध्यान दिए रहना चाहिए, कि गीता में जिस तात्त्विक दृष्टि से इस प्रश्न का विचार किया गया है, वह दृष्टि निष्काम कर्म वाले कर्मयोग की है; काम्य-कर्म करनेवाले मीमांसकों की या कर्म छोड़ने वाले संन्यासमार्गियों की नहीं है। गीता की इस दृष्टि को स्वीकार कर लेने पर तो यही कहना पड़ता है, कि 'कर्म-शून्यता' के अर्थ में 'अकर्म' इस जगत में कही भी नहीं रह सकता अथवा कोई भी मनुष्य कभी कर्मशून्य नहीं हो सकता (गी॰ 3.5; 18.11); क्योंकि सोना, उठना, बैठना और कम-से-कम जीवित रहना तो किसी का भी छूट नहीं जाता। और यदि कर्मशून्य होना सम्भव नहीं है, तो निश्चय करना पड़ता है, कि अकर्म कहे किसे? इसके लिए गीता का यह उत्तर है, कि कर्म की निरी क्रिया न समझकर उससे आगे होनेवाले शुभ-अशुभ आदि परिणामों का विचार करके, कर्म का कर्मत्व या अकर्मत्व निश्चित करो। यदि सृष्टि के माने ही कर्म है, तो मनुष्य जब तक सृष्टि में है, तब तक उससे कर्म नहीं छूटता। अतः कर्म और अकर्म का जो विचार करना हो, वह इसी दृष्टि से करना चाहिए, कि मनुष्य को वह कर्म कहाँ तक बद्ध करेगा। करने पर भी जो कर्म हमें बद्ध नहीं करता, उसके विषय में कहना चाहिए, कि उसका कर्मत्व अथवा बन्धकत्व नष्ट हो गया; और यदि किसी भी कर्म का बन्धकत्व अर्थात् कर्मत्व इस प्रकार नष्ट हो गया, तो फिर वह कर्म 'अकर्म' ही हुआ। अकर्म का प्रचलित सांसारिक अर्थ कर्मशून्यता है सही, परन्तु शास्त्रीय दृष्टि से विचार करने पर उसका यहाँ मेल नहीं मिलता। क्योंकि हम देखते है, कि चुपचाप बैठना अर्थात् कर्म न करना भी कई बार कर्म ही हो जाता है। उदाहरणार्थ, अपने माँ-बाप को कोई मारता-पीटता हो, तो उसको न रोककर चुप्पी साधे बैठे रहना, उस समय यदि व्यावहारिक दृष्टि से अकर्म अर्थात् कर्मशून्यता हो तो भी वह कर्म ही – अधिक क्या कहे, विकर्म - है; और कर्मविपाक की दृष्टि से उसके अशुभ परिणाम हमें भोगना ही पड़ेगा। अतएव गीता इस श्लोक में विरोधाभास की रीति से बड़ी खूबी के साथ कहती है, कि ज्ञानी वही है, जिसने जान लिया, कि अकर्म में भी (कभी-कभी तो भयानक) कर्म हो जाता है, और कर्म करके भी वह कर्मविपाक की दृष्टि से मरा-सा, अर्थात् कर्म हो जाता है; तथा यही अर्थ अगले श्लोक में भिन्न-भिन्न रीति से वर्णित है। कर्म के फल का बन्धन न लगने के लिए गीताशास्त्र के अनुसार यही एक सच्चा साधन है, कि निःसंग बुद्धि से अर्थात् फलाशा छोड़कर निष्काम बुद्धि से, वह कर्म किया जावें (गीतारहस्य प्र॰ 5, पृ. 111 – 115; प्र॰ 10, पृ. 266 – 287)। अतः इस साधन का उपयोग कर निःसंग बुद्धि से जो कर्म किया जाए, वही गीता के अनुसार प्रशस्त – सात्त्विक – कर्म है (गीता 18.9); और गीता के मत में वही सच्चा 'अकर्म' है। क्योंकि उसका कर्मत्व, अर्थात् कर्मविपाक की क्रिया के अनुसार बन्धकत्व, निकल जाता है। मनुष्य जो कुछ कम करते हैं (और इस 'करते है' पद में चुपचाप निठल्ले बैठे रहने का भी समावेश करना चाहिए), उनमें से उक्त प्रकार के अर्थात् 'सात्त्विक कर्म' अथवा गीता के अनुसार 'अकर्म' घटा देने से बाकी जो कर्म रह जाते है, उनके दो भाग हो सकते हैं; एक राजस और दूसरा तामस। इनमें से तामस कर्म मोह और अज्ञान हुआ करते है, इसलिए उन्हें विकर्म कहते है - फिर यदि कोई कर्म मोह से छोड़ दिया जाए, तो वही विकर्म ही है; अकर्म नहीं (गीता॰ 18.7)। अब रह गए राजस कर्म। ये कर्म पहले दर्जे के अर्थात् सात्त्विक नहीं हैं; अथवा ये वे कर्म भी नहीं हैं, जिन्हें गीता सचमुच 'अकर्म' कहती है। गीता इन्हें 'राजस' कर्म कहती है, परन्तु यदि कोई चाहे, तो ऐसे राजस कर्मों को केवल 'कर्म' भी कह सकते है। तात्पर्य, क्रियात्मक स्वरूप से अथवा कोरे धर्मशास्त्र से भी कर्म-अकर्म की निश्चय नहीं होता; किन्तु कर्म के बन्धकत्व से यह निश्चय किया जाता है, कि कर्म है या अकर्म? अष्टावक्रगीता संन्यास-मार्ग की है; तथापि उसमें भी कहा है – निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरूपजायते। प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलभागिनी॥ अर्थात् मूर्खों की निवृत्ति, (अथवा हठ से या मोह के द्वारा कर्म से विमुखता) वास्तव में प्रवृत्ति अर्थ कर्म है और पंडित लोगों की प्रवृत्ति (अर्थात् निष्काम कर्म) से ही निवृत्ति यानी कर्मत्याग का फल मिलता है (अष्टा॰ 18.61)। गीता के उक्त श्लोक में यही अर्थ विरोधाभासरूपी अलंकार की रीति से बड़ी सुन्दरता से बतलाया गया है। गीता के अकर्म के इस लक्षण को भली-भाँति समझे बिना गीता के कर्म-अकर्म के विवेचन का मर्म कभी भी समझ में आने का नहीं। अब इसी अर्थ को अगले श्लोकों में अधिक व्यक्त करते हैं –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ४, श्लोक ४.१८