भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ४.१६ ·

English

मूल श्लोक

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

kiṃ karma kimakarmeti kavayo'pyatra mohitāḥ tatte karma pravakṣyāmi yajjñātvā mokṣyase'śubhāt

४.१६अध्याय ४ · ज्ञानविभागयोग४२ में से श्लोक १६

अनुवाद

इस विषय में बड़े-बड़े विद्वान को भी भ्रम हो जाता है, कि कौन कर्म है और कौन अकर्म; (अतएव) वैसा कर्म तुझे बतलाते हूँ कि जिसे जान लेने से तू पापमुक्त होगा।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

'अकर्म' नञ् समाप्त है। व्याकरण की रीति से उसके अ = नञ् शब्द के 'अभाव' अथवा 'अप्राशस्त्य' दो अर्थ हो सकते है; और यह नहीं कह सकते कि इस स्थल पर ये दोनों ही अर्थ विवक्षित न होंगे। परन्तु अगले श्लोक में 'विकर्म' नाम से कर्म का एक और तीसरा भेद किया है, अतएव इस श्लोक में अकर्म शब्द से विशेषतः वही कर्मत्याग उद्दिष्ट है, जिसे संन्यासमार्ग-वाले लोग 'कर्म का स्वरूपतः त्याग' कहते है। संन्यास-मार्गवाले कहते है कि 'सब कर्म छोड़ दो;' परन्तु 18 वें श्लोक की टिप्पणी से देख पड़ेगा कि इस बात को दिखलाने के लिए ही यह विवेचन किया गया है कि कर्म को बिलकुल ही त्याग देने की कोई आवश्यकता नहीं है, संन्यासमार्ग-वालों का कर्मत्याग सच्चा 'अकर्म' नहीं है; अकर्म का मर्म ही कुछ और है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ४, श्लोक ४.१६