भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ४.१५ ·

English

मूल श्लोक

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

evaṃ jñātvā kṛtaṃ karma pūrvairapi mumukṣubhiḥ kuru karmaiva tasmāttvaṃ pūrvaiḥ pūrvataraṃ kṛtam

४.१५अध्याय ४ · ज्ञानविभागयोग४२ में से श्लोक १५

अनुवाद

इसे जानकर प्राचीन समय के मुमुक्षु लोगों ने भी कर्म किया था। इसलिए पूर्व के लोगों के किए हुए अति प्राचीन कर्म को ही तू कर।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस प्रकार मोक्ष और कर्म का विरोध नहीं है, अतएव अर्जुन को निश्चित उपदेश किया है, कि तू कर्म कर। परन्तु संन्यासमार्ग-वालों का कथन है कि 'कर्मों के छोड़ने से अर्थात् अकर्म से ही मोक्ष मिलता है' इस पर यह शंका होती है, कि ऐसे कथन का बीज क्या है? अतएव अब कर्म और अकर्म के विवेचन का आरम्भ करके तेईसवें श्लोक में सिद्धान्त कहते है, कि अकर्म कुछ कर्मत्याग नहीं है, निष्काम-कर्म को ही अकर्म कहना चाहिए।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ४, श्लोक ४.१५