मूल श्लोक
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
evaṃ jñātvā kṛtaṃ karma pūrvairapi mumukṣubhiḥ kuru karmaiva tasmāttvaṃ pūrvaiḥ pūrvataraṃ kṛtam
अनुवाद
इसे जानकर प्राचीन समय के मुमुक्षु लोगों ने भी कर्म किया था। इसलिए पूर्व के लोगों के किए हुए अति प्राचीन कर्म को ही तू कर।
टिप्पणी
इस प्रकार मोक्ष और कर्म का विरोध नहीं है, अतएव अर्जुन को निश्चित उपदेश किया है, कि तू कर्म कर। परन्तु संन्यासमार्ग-वालों का कथन है कि 'कर्मों के छोड़ने से अर्थात् अकर्म से ही मोक्ष मिलता है' इस पर यह शंका होती है, कि ऐसे कथन का बीज क्या है? अतएव अब कर्म और अकर्म के विवेचन का आरम्भ करके तेईसवें श्लोक में सिद्धान्त कहते है, कि अकर्म कुछ कर्मत्याग नहीं है, निष्काम-कर्म को ही अकर्म कहना चाहिए।
— Lokmanya Tilak