भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ४.१४ ·

English

मूल श्लोक

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बद्ध्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

na māṃ karmāṇi limpanti na me karmaphale spṛhā iti māṃ yo'bhijānāti karmabhirna sa baddhyate

४.१४अध्याय ४ · ज्ञानविभागयोग४२ में से श्लोक १४

अनुवाद

मुझे कर्म का लेप अर्थात् बाधा नहीं होती; (क्योंकि ) कर्म के फल में मेरी इच्छा नहीं है। जो मुझे इस प्रकार जानता है, उसे कर्म की बाधा नहीं होती।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

ऊपर नवम श्लोक में जो दो बातें कही है, कि मेरे 'जन्म' और 'कर्म' को जो जानता है वह मुक्त हो जाता है, उनमें से कर्म के तत्त्व का स्पष्टीकरण इस श्लोक में किया है। 'जानता है' शब्द से यहाँ 'जानकर तदनुसार बर्तने लगता है' इतना अर्थ विवक्षित है। भावार्थ यह है कि भगवान को उनके कर्म की बाधा नहीं होती, इसका यह कारण है कि वे फलाशा रखकर काम ही नहीं करते; और इसे जानकर तदनुसार जो बर्ता है उसको कर्मों का बन्धन नहीं होता। अब, इस श्लोक के सिद्धान्त को ही प्रत्यक्ष उदाहरण से दृढ़ करते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ४, श्लोक ४.१४