मूल श्लोक
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
cāturvarṇyaṃ mayā sṛṣṭaṃ guṇakarmavibhāgaśaḥ tasya kartāramapi māṃ viddhyakartāramavyayam
अनुवाद
(ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इस प्रकार) चारों वर्णों की व्यवस्था गुण और कर्म के भेद से मैंने निर्माण की है। इसे तू ध्यान में रख, कि मैं उसका कर्ता भी हूँ और अकर्ता अर्थात् उसे न करनेवाला अव्यय (मैं ही) हूँ।
टिप्पणी
अर्थ यह है कि परमेश्वर कर्ता भले ही हो, पर अगले श्लोक के वर्णनानुसार वह सदैव निःसंग है, इसका कारण अकर्ता ही है (गी॰ 5.14 देखो)। परमेश्वर के स्वरूप के 'सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्' ऐसे दूसरे भी विरोधाभासात्मक वर्णन है (गी॰ 13.14)। चातुर्वर्ण्य के गुण और भेद का निरूपण आगे अठारहवें अध्याय (18.41 – 46) में किया गया है। अब भगवान ने 'करके न करनेवाला' ऐसा जो अपना वर्णन किया है, उसका मर्म बतलाते है –
— Lokmanya Tilak