मूल श्लोक
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
kāṅkṣantaḥ karmaṇāṃ siddhiṃ yajanta iha devatāḥ kṣipraṃ hi mānuṣe loke siddhirbhavati karmajā
अनुवाद
(कर्मबन्धन के नाश की नहीं, केवल) कर्मफल की इच्छा करनेवाले लोग इस लोक में देवताओं की पूजा इसलिए किया करते है कि (ये) कर्मफल (इसी) मनुष्यलोक में शीघ्र ही मिल जाते है।
टिप्पणी
यही विचार सातवें अध्याय (21, 22) में फिर आए है। परमेश्वर की आराधना का सच्चा फल है मोक्ष, परन्तु वह तभी प्राप्त होता है कि जब कालान्तर से एवं दीर्घ और एकान्त उपासना से कर्मबन्ध का पूर्ण नाश हो जाता है; परन्तु इतने दूरदर्शी और दीर्घ उद्योगी पुरुष बहुत ही थोड़े होते हैं। इस श्लोक का भावार्थ यह है कि बहुतेरों को तो अपने उद्योग अर्थात् कर्म से इसी लोक में कुछ न कुछ प्राप्त करना होता है, और ऐसे ही लोग देवताओं की पूजा किया करते है (गीतार॰ पृ. 422 देखो)। गीता का यह भी कथन है कि पर्याय से यह भी तो परमेश्वर का ही पूजन होता है, और बढ़ते-बढ़ते इस योग का पर्यवसान निष्काम भक्ति में होकर अन्त में मोक्ष प्राप्त हो जाता है (गी॰ 7.16)। पहले कह चुके है कि धर्म की संस्थापना करने के लिए क्या करना पड़ता है –
— Lokmanya Tilak