मूल श्लोक
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yajñārthātkarmaṇo'nyatra loko'yaṃ karmabandhanaḥ tadarthaṃ karma kaunteya muktasaṅgaḥ samācara
अनुवाद
यज्ञ के लिए जो कर्म किए जाते है, उनके अतिरिक्त, अन्य कर्मों से यह लोक बँधा हुआ है। तदर्थ अर्थात् यज्ञार्थ (किए जाने वाले) कर्म (भी) तू आसक्ति या फलाशा छोड़ कर करता जा।
टिप्पणी
इस श्लोक के पहले चरण में मीमांसकों का और दूसरे में गीता का सिद्धान्त बतलाया गया है। मीमांसकों का कथन है कि जब वेदों ने ही यज्ञयागादि कर्म मनुष्यों के लिए नियत कर दिए हैं, और जब कि ईश्वरनिर्मित सृष्टि का व्यवहार ठीक-ठीक चलते रहने के लिए यह यज्ञ-चक्र आवश्यक है, तब कोई भी इन कर्मों का त्याग नहीं कर सकता; यदि कोई इनका त्याग कर देगा, तो समझना होगा कि वह श्रौतधर्म से वंचित हो गया। परन्तु कर्मविपाकप्रक्रिया का सिद्धान्त है, कि प्रत्येक कर्म का फल मनुष्य को भोगना ही पड़ता है; उन के अनुसार कहना पड़ता है कि यज्ञ के लिए मनुष्य जो-जो कर्म करेगा उसका भला या बुरा फल भी उसे भोगना ही पड़ेगा। मीमांसकों का इस पर यह उत्तर है कि वेदों की ही आज्ञा है कि 'यज्ञ' करना चाहिए, इसलिए यज्ञार्थ जो-जो कर्म किए जावेंगे वे सब ईश्वरसम्मत होंगे, अतः उन कर्मों से कर्त्ता बद्ध नहीं हो सकता। परन्तु यज्ञों के सिवा दूसरे कर्मों के लिए – उदाहरणार्थ, केवल अपना पेट भरने के लिए – मनुष्य जो कुछ करता है वह यज्ञार्थ नहीं हो सकता; उसमें तो केवल मनुष्य की ही निजी लाभ है। यही कारण है कि जो मीमांसक उसे 'पुरुषार्थ' कर्म कहते है, और उन्होंने निश्चित किया है कि ऐसे यानी यज्ञार्थ के अतिरिक्त अन्य कर्म अर्थात् पुरुषार्थ कर्म का जो कुछ भला या बुरा फल होता है वह मनुष्य को भोगना पड़ता है – यही सिद्धान्त उक्त श्लोक की पहली पंक्ति में है (देखो गीतार॰ प्र॰ 3. पृ 52 – 55)। कोई-कोई टीकाकार यज्ञ विष्णु ऐसा गौण अर्थ करके कहते है कि यज्ञार्थ शब्द का अर्थ विष्णुप्रीत्यर्थ या परमेश्वरार्पणपूर्वक है। परन्तु हमारी समझ से यह अर्थ खींचातानी का और क्लिष्ट है। यहाँ पर प्रश्न होता है कि यज्ञ के लिए जो कर्म करने पड़ते है; उनके सिवा यदि मनुष्य दूसरे कर्म कुछ भी न करें तो क्या वह कर्मबन्धन से छूट सकता है? क्योंकि यज्ञ भी तो कर्म ही है, और उसका स्वर्ग-प्राप्तिरूप जो शास्त्रोक्त फल है वह मिले बिना नहीं रहता। परन्तु गीता के दूसरे ही अध्याय में स्पष्ट रीति से बतलाया गया है, कि यह स्वर्ग-प्राप्तिरूप फल मोक्षप्राप्ति के विरुद्ध है (देखो गी॰ 2.40 – 44; और 9.20, 21)। इसीलिए उक्त श्लोक के दूसरे चरण में यह बात फिर बतलाई गई है कि मनुष्य को यज्ञार्थ जो कुछ नियत कर्म करना होता है उसे वह फल की आशा छोड़कर अर्थात् केवल कर्तव्य समझ कर करें, और इसी अर्थ का प्रतिपादन आगे सात्त्विक यज्ञ की व्याख्या करते समय किया गया है (देखो गी॰ 17.11 और 18.6)। इस श्लोक का भावार्थ यह है कि इस प्रकार सब कर्म यज्ञार्थ और सो भी फलाशा छोड़कर करने से, (1) वे मीमांसकों के न्यायानुसार ही किसी भी प्रकार मनुष्य को बद्ध नहीं कहते, क्योंकि वे तो यज्ञार्थ किए जाते है और (2) उनका स्वर्ग-प्राप्तिरूप शास्त्रोक्त एवं अनित्य फल मिलने के बदले मोक्ष-प्राप्ति होती है, क्योंकि वे फलाशा छोड़कर किए जाते है। आगे 19 वें श्लोक में और फिर चौथे अध्याय के 23 वें श्लोक में यही अर्थ दुबारा प्रतिपादित हुआ है। तात्पर्य यह है कि मीमांसकों के इस सिद्धान्त – 'यज्ञार्थ कर्म करने चाहिए क्योंकि वे बन्धक नहीं होते' में भगवद्गीता ने और भी यह सुधार कर दिया है कि 'जो कर्म यज्ञार्थ किए जावे, उन्हें भी फलाशा छोड़कर करना चाहिए।' किन्तु इस पर भी यह शंका होती है कि मीमांसकों के सिद्धान्त को इस प्रकार सुधारने का प्रयत्न करके यज्ञ-याग आदि गार्हस्थ्यवृत्ति को जारी रखने की अपेक्षा, क्या यह अधिक अच्छा नहीं है, कि कर्मों की झंझट से छूटकर मोक्ष-प्राप्ति के लिए सब कर्मों को छोड़कर संन्यास ले लें? भगवद्गीता इस प्रश्न का साफ यही एक उत्तर देती है कि 'नहीं।' क्योंकि यज्ञ-चक्र के बिना इस जगत के व्यवहार जारी नहीं रह सकते। अधिक क्या कहें, जगत के धारण-पोषण के लिए ब्रह्मा ने इस चक्र को प्रथम उत्पन्न किया है; और जबकि जगत की सुस्थिति या संग्रह ही भगवान को इष्ट है, तब इस यज्ञ-चक्र को कोई भी नहीं छोड़ सकता। अब यही अर्थ अगले श्लोक में बतलाया गया है। इस प्रकरण में पाठकों को स्मरण रखना चाहिए कि 'यज्ञ' शब्द यहाँ केवल श्रौत यज्ञ के ही अर्थ में प्रयुक्त नहीं हैं, किन्तु उसमें स्मार्त यज्ञों का तथा चातुर्वर्ण्य आदि के यथाधिकार सब व्यावहारिक कर्मों का समावेश है।
— Lokmanya Tilak