भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ३.५ ·

English

मूल श्लोक

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

na hi kaścitkṣaṇamapi jātu tiṣṭhatyakarmakṛt kāryate hyavaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijairguṇaiḥ

३.५अध्याय ३ · कर्मयोग४३ में से श्लोक ५

अनुवाद

क्योंकि कोई मनुष्य (कुछ-न-कुछ) कर्म किए बिना क्षण भर भी नहीं रह सकता। प्रकृति के गुण प्रत्येक गुण परतन्त्र मनुष्य को (सदा कुछ न कुछ) कर्म करने में लगाया ही करते हैं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

चौथे श्लोक के पहले चरण में जो 'नैष्कर्म्य' पद है, उसका 'ज्ञान' अर्थ मानकर संन्यासमार्ग-वाले टीकाकारों ने इस श्लोक का अर्थ अपने सम्प्रदाय के अनुकूल इस प्रकार बना लिया है - 'कर्मों का आरम्भ न करने से ज्ञान नहीं होता, अर्थात् कर्मों से ही ज्ञान होता क्योंकि कर्म ज्ञानप्राप्ति का साधन है।' परन्तु यह अर्थ न तो सरल है और न ठीक है। नैष्कर्म्य शब्द का उपयोग वेदान्त और मीमांसा दोनों शास्त्रों में कई बार किया गया है और सुरेश्वराचार्य का 'नैष्कर्म्यसिद्धि' नामक इस विषय पर एक ग्रन्थ भी है। तथापि, नैष्कर्म्य के ये तत्त्व कुछ नए नहीं है। न केवल सुरेश्वराचार्य ही के किन्तु मीमांसा और वेदान्त के सूत्र बनने के भी, पूर्व से ही उनका प्रचार होता आ रहा है। यह बतलाने की कोई आवश्यकता नहीं, कि कर्म बन्धक होता ही है। इसलिए पारे का उपयोग करने से पहले उसे मारकर जिस प्रकार वैद्य लोग शुद्ध कर लेते है, उसी प्रकार कर्म करने के पहले ऐसा उपाय करना पड़ता है जिससे उसका बन्धकत्व का दोष मिट जाएँ। और, ऐसी युक्ति से कर्म करने की स्थिति को ही 'नैष्कर्म्य' कहते है। इस प्रकार बन्धकत्वरहित कर्म मोक्ष के लिए बाधक नहीं होते, अतएव मोक्ष-शास्त्र का यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है, कि यह स्थिति कैसे प्राप्त की जाएँ? मीमांसक लोग इसका उत्तर देते है कि नित्य और (निमित्त होने पर) नैमित्तिक कर्म तो करना चाहिए, पर काम्य और निषिद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। इससे कर्म का बन्धकत्व नहीं रहता और नैष्कर्म्यावस्था सुलभ रीति से प्राप्त हो जाती है। परन्तु वेदान्तशास्त्र ने सिद्धान्त किया है कि मीमांसकों की यह युक्ति गलत है; और इस बात का विवेचन गीतारहस्य के दसवें प्रकरण (पृ. 274) में किया गया है। कुछ और लोगों का कथन है कि यदि कर्म किए ही न जावें तो उनसे बाधा कैसे हो सकती है? इसलिए उनके मतानुसार नैष्कर्म्य अवस्था प्राप्त करने के लिए सब कर्मों ही को छोड़ देना चाहिए। इनके मत से कर्मशून्यता को ही 'नैष्कर्म्य' कहते है। चौथे श्लोक में यह बतलाया गया है कि यह मत ठीक नहीं है, इससे तो सिद्धि अर्थात् मोक्ष भी नहीं मिलता; और पाँचवें श्लोक इसका कारण भी बतला दिया है। यदि हम कर्म को छोड़ देने का विचार करें, तो जब तक यह देह है तब तक सोना, बैठना इत्यादि कर्म कभी रुक ही नहीं सकते (गी॰ 5.9 और 18), इसलिए कोई भी मनुष्य कर्मशून्य कभी नहीं हो सकता। फलतः कर्मशून्यरूपी नैष्कर्म्य असम्भव है। सारांश, कर्मरूपी बिच्छू कभी नहीं मरता। इसलिए ऐसा कोई उपाय सोचना चाहिए कि जिससे वह विषरहित हो जाएँ। गीता का सिद्धान्त है कि कर्मों में से अपनी आसक्ति को हटा लेना ही इसका एक मात्र उपाय है। आगे अनेक स्थानों में इसी उपाय का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। परन्तु इस पर भी शंका हो सकती है कि यद्यपि कर्मों को छोड़ देना नैष्कर्म्य नहीं है, तथापि संन्यासमार्ग-वाले तो सब कर्मों का संन्यास अर्थात् त्याग करके ही मोक्ष प्राप्त करते हैं, अतः मोक्ष की प्राप्ति के लिए कर्मों का त्याग करना आवश्यक है। इसका उत्तर गीता इस प्रकार देती है कि संन्यासमार्ग-वालों को मोक्ष मिलता है सही, परन्तु वह कुछ उन्हें कर्मों का त्याग करने से नहीं मिलता, किन्तु मोक्ष-सिद्धि उनके ज्ञान का फल है। यदि केवल कर्मों का त्याग करने से ही मोक्ष-सिद्धि होती, तो फिर पत्थरों को भी मुक्ति मिलनी चाहिए! इससे ये तीन बातें सिद्ध होती है – (1) नैष्कर्म्य कुछ कर्मशून्यता नहीं है, (2) कर्मों को बिलकुल त्याग देने का कोई कितना भी प्रयत्न क्यों न करें, परन्तु वे छूट नहीं सकते, और (3) कर्मों का त्याग देना सिद्धि प्राप्त करने का उपाय नहीं हैं; यही बातें ऊपर के श्लोक में बतलाई गई है। जब ये तीनों बातें सिद्ध हो गई, तब अठारहवें अध्याय के कथनानुसार 'नैष्कर्म्यसिद्धि' की (देखो गीता 18.48 और 49) प्राप्ति के लिए यही एक मार्ग शेष रह जाता है, कि कर्म करना तो छोड़े नहीं, पर ज्ञान के द्वारा आसक्ति का क्षय करके सब कर्म सदा करते रहे। क्योंकि ज्ञान मोक्ष का साधन है तो सही, पर कर्मशून्य रहना भी कभी सम्भव नहीं, इसलिए कर्मों के बन्धकत्व (बन्धन) के नष्ट करने के लिए आसक्ति छोड़कर उन्हें करना आवश्यक होता है। इसी को कर्मयोग कहते है; और अब बतलाते है कि यही ज्ञान-कर्मसमुच्चयात्मक मार्ग विशेष योग्यता का अर्थात् श्रेष्ठ है -

— Lokmanya Tilak

अध्याय ३, श्लोक ३.५