मूल श्लोक
अर्जुन उवाच ।अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
arjuna uvāca atha kena prayukto'yaṃ pāpaṃ carati pūruṣaḥ anicchannapi vārṣṇeya balādiva niyojitaḥ
अनुवाद
अर्जुन ने कहा: हे वार्ष्णेय (श्रीकृष्ण)! अब (यह बतलाओ कि ) मनुष्य अपनी इच्छा ने रहने पर भी किस की प्रेरणा से पाप करता है, मानो कोई जबरदस्ती सी करता हो?