मूल श्लोक
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
ye tvetadabhyasūyanto nānutiṣṭhanti me matam sarvajñānavimūḍhāṃstānviddhi naṣṭānacetasaḥ
अनुवाद
परन्तु जो दोषदृष्टि से शंकाएँ करके मेरे इस मत के अनुसार नहीं बर्ते उन सर्वज्ञान-विमूढ़ अर्थात् पक्के मूर्ख अविवेकि यों को नष्ट हुए समझो।
टिप्पणी
कर्मयोग निष्काम बुद्धि से कर्म करने के लिए कहता है। उसकी श्रेयस्करता के सम्बन्ध में ऊपर अन्वयव्यतिरेक से जो फलश्रुति बतलाई गई है, उससे पूर्णतया व्यक्त हो जाता है कि गीता में कौन-सा विषय प्रतिपादित है। इसी कर्मयोग-निरूपण की पूर्ति के हेतु भगवान प्रकृति की प्रबलता का और फिर उसे रोकने के लिए इन्द्रिय-निग्रह का वर्णन करते है –
— Lokmanya Tilak