भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ३.३२ ·

English

मूल श्लोक

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

ye tvetadabhyasūyanto nānutiṣṭhanti me matam sarvajñānavimūḍhāṃstānviddhi naṣṭānacetasaḥ

३.३२अध्याय ३ · कर्मयोग४३ में से श्लोक ३२

अनुवाद

परन्तु जो दोषदृष्टि से शंकाएँ करके मेरे इस मत के अनुसार नहीं बर्ते उन सर्वज्ञान-विमूढ़ अर्थात् पक्के मूर्ख अविवेकि यों को नष्ट हुए समझो।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

कर्मयोग निष्काम बुद्धि से कर्म करने के लिए कहता है। उसकी श्रेयस्करता के सम्बन्ध में ऊपर अन्वयव्यतिरेक से जो फलश्रुति बतलाई गई है, उससे पूर्णतया व्यक्त हो जाता है कि गीता में कौन-सा विषय प्रतिपादित है। इसी कर्मयोग-निरूपण की पूर्ति के हेतु भगवान प्रकृति की प्रबलता का और फिर उसे रोकने के लिए इन्द्रिय-निग्रह का वर्णन करते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ३, श्लोक ३.३२