मूल श्लोक
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
prakṛterguṇasammūḍhāḥ sajjante guṇakarmasu tānakṛtsnavido mandānkṛtsnavinna vicālayet
अनुवाद
प्रकृति के गुणों से बहके हुए लोग गुण और कर्मों में ही आसक्त रहते है; इन असर्वज्ञ और मन्द जनों को सर्वज्ञ पुरुष (अपने कर्मत्याग से किसी अनुचित मार्ग में लगाकर) बिचला न दे।
टिप्पणी
यहाँ 26 वें श्लोक के अर्थ का ही अनुवाद किया गया है। इस श्लोक में जो ये सिद्धान्त है कि प्रकृति भिन्न है और आत्मा भिन्न है, प्रकृति अथवा माया ही सब कुछ कहती है, आत्मा कुछ करता-धरता नहीं है, जो इस तत्त्व को जान लेता है वही बुद्ध अथवा ज्ञानी हो जाता है, उसे कर्म का बन्धन नहीं होता इत्यादि – वे मूल में कापिल-सांख्यशास्त्र के है। गीतारहस्य के 6 वें प्रकरण ( पृ. 164 – 166) में इनका पूर्ण विवेचन किया गया है, उसे देखिए। 28 वें श्लोक का कुछ लोग यों अर्थ करते है, कि गुण यानी इन्द्रियों गुणों में यानी विषयों में, बर्ती है। यह अर्थ कुछ शुद्ध नहीं है; क्योंकि सांख्य-शास्त्र के अनुसार ग्यारह इन्द्रियाँ और शब्द-स्पर्श आदि पाँच विषय मूल-प्रकृति के 23 गुणों में से ही गुण हैं। परन्तु इससे अच्छा अर्थ तो यह है कि प्रकृति से समस्त अर्थात् चौबीसों गुणों को लक्ष्य करके ही यह 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' का सिद्धान्त स्थिर किया गया है (देखो गी॰13.19 – 22 और 14.23)। हमने उसका शब्दशः और व्यापक रीति से अनुवाद किया है। भगवान ने यह बतलाया है कि ज्ञानी और अज्ञानी एक ही कर्म करें तो भी उनमें बुद्धि की दृष्टि से बहुत बड़ा भेद रहता है (गीतार॰ पृ. 310 और 328)। अब इस पूरे विवेचन के सार-रूप से यह उपदेश करते है –
— Lokmanya Tilak