मूल श्लोक
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
tattvavittu mahābāho guṇakarmavibhāgayoḥ guṇā guṇeṣu vartanta iti matvā na sajjate
अनुवाद
परन्तु हे महाबाहु अर्जुन! गुण और कर्म दोनों ही मुझ से भिन्न है। इस तत्त्व को जानने वाला (ज्ञानी पुरुष) यह समझ कर इनमें आसक्त नहीं होता, कि गुणों का यह खेल आपस में हो रहा है।