मूल श्लोक
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
karmaṇaiva hi saṃsiddhimāsthitā janakādayaḥ lokasaṅgrahamevāpi sampaśyankartumarhasi
अनुवाद
जनक आदि ने भी इस प्रकार कर्म से ही सिद्धि पाई है। इसी प्रकार लोक-संग्रह पर भी दृष्टि देकर तुझे कर्म करना ही उचित है।
टिप्पणी
पहले चरण में इस बात का उदाहरण दिया है कि निष्काम कर्मों से सिद्धि मिलती है और दूसरे चरण में भिन्न रीति से प्रतिपादन का आरम्भ कर दिया है। यह तो सिद्ध किया, कि ज्ञानी पुरुषों का लोगों में कुछ अटका नहीं रहता; तो भी जब उनके कर्म छूट ही नहीं सकते तब तो उन्हें निष्काम कर्म ही करना चाहिए। परन्तु, यद्यपि यह युक्ति नियम-संगत है कि कर्म जब छूट नहीं सकते तब उन्हें करना ही चाहिए, तथापि सिर्फ इसी से साधारण मनुष्यों का पूरा-पूरा विश्वास नहीं हो जाता। मन में शंका होती है कि क्या कर्म टाले नहीं टलते इसलिए उन्हें करना चाहिए, उसमें और कोई साध्य नहीं है? अतएव इस श्लोक के दूसरे चरण में यह दिखलाने का आरम्भ कर दिया है कि इस जगत में अपने कर्म से लोकसंग्रह करना ज्ञानी पुरुष का अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रत्यक्ष साध्य है। 'लोकसंग्रहमेवापि' के 'एवापि' पद का यही तात्पर्य है, और इससे स्पष्ट होता है कि अब भिन्न रीति के प्रतिपादन का आरम्भ हो गया है, 'लोकसंग्रह' शब्द में 'लोक' का अर्थ व्यापक है; अतः इस शब्द में न केवल मनुष्यजाति को ही, वरन् सारे जगत को सन्मार्ग पर लाकर, उसको नाश से बचाते हुए संग्रह करना अर्थात् भली-भाँति धारण, पोषणपालन या बचाव करना इत्यादि सभी बातों का समावेश हो जाता है। गीतारहस्य के ग्यारहवें प्रकरण (पृ. 328 – 226) में इन बातों का विस्तृत विचार किया गया है, इसलिए हम यहाँ उसकी पुनरुक्ति नहीं कहते। अब पहले यह बतलाते है कि लोकसंग्रह करने का यह कर्तव्य या अधिकार ज्ञानी पुरुष का ही क्यों है –
— Lokmanya Tilak