मूल श्लोक
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yastvātmaratireva syādātmatṛptaśca mānavaḥ ātmanyeva ca santuṣṭastasya kāryaṃ na vidyate
अनुवाद
परन्तु जो मनुष्य केवल आत्मा में ही रत, आत्मा में ही तृप्त और आत्मा में ही संतुष्ट हो जाता है उसके लिए (स्वयं अपना) कुछ भी कार्य (शेष) नहीं रह जाता;