मूल श्लोक
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
evaṃ pravartitaṃ cakraṃ nānuvartayatīha yaḥ aghāyurindriyārāmo moghaṃ pārtha sa jīvati
अनुवाद
हे पार्थ! इस प्रकार (जगत के धारणार्थ) चला ये हुए कर्म या यज्ञ के चक्र को जो इस जगत में आगे नहीं चलाता, उसकी आयु पापरूप है; उस इन्द्रियलम्पट को (अर्थात् देवताओं को न देकर, स्वयं उपभोग करनेवाले का) जीवन व्यर्थ है।
टिप्पणी
स्वयं ब्रह्मा ने ही – मनुष्यों ने नहीं – लोगों के धारण-पोषण के लिए यज्ञमय कर्म या चातुर्वर्ण्य-वृत्ति उत्पन्न की है। इस सृष्टि का क्रम चलते रहने के लिए (श्लोक 14) और साथ ही साथ अपना निर्वाह होने के लिए (श्लोक 8), इन दोनों कारणों से, इस वृत्ति की आवश्यकता है; इससे सिद्ध होता है कि यज्ञचक्र को अनासक्त बुद्धि से जगत में सदा चलाते जाना चाहिए। अब यह बात मालूम हो चुकी, कि मीमांसकों का या त्रयीधर्म का कर्मकाण्ड (यज्ञ-चक्र) गीताधर्म में अनासक्त बुद्धि की युक्ति से कैसे स्थिर रखा गया है (देखो गीतार॰ प्र॰ 11 पृ. 345 – 346)। कई संन्यास-मार्गवाले वेदान्ती इस विषय में शंका करते हैं कि आत्मज्ञानी पुरुष को जब यहाँ मोक्ष प्राप्त हो जाता है, और उसे जो कुछ प्राप्त करना होता है, वह सब उसे यहीं मिल जाता है, तब उसे कुछ भी कर्म करने की आवश्यकता नहीं है – और उसको कर्म करना भी न चाहिए। इस का उत्तर अगले तीन श्लोकों में दिया जाता है।
— Lokmanya Tilak