भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ३.१५ ·

English

मूल श्लोक

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माऽक्षरसमुद्भवम् ।तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

karma brahmodbhavaṃ viddhi brahmā'kṣarasamudbhavam tasmātsarvagataṃ brahma nityaṃ yajñe pratiṣṭhitam

३.१५अध्याय ३ · कर्मयोग४३ में से श्लोक १५

अनुवाद

कर्म की उत्पत्ति ब्रह्म से अर्थात् प्रकृति से हुई, और यह ब्रह्म अक्षर से अर्थात् परमेश्वर से हुआ है। इसलिए (यह समझो कि ) सर्वगत ब्रह्म ही यज्ञ में सदा अधिष्ठित रहता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

कोई-कोई इस श्लोक के 'ब्रह्म' शब्द का अर्थ 'प्रकृति' नहीं समझते। वे कहते है कि यहाँ ब्रह्म का अर्थ 'वेद' है। परन्तु 'ब्रह्म' शब्द का 'वेद' अर्थ करने से यद्यपि इस वाक्य में आपत्ति नहीं हुई कि 'ब्रह्म अर्थात् वेद परमेश्वर से हुए है,' तथापि वैसा अर्थ करने से 'सर्वगत ब्रह्म यज्ञ में है' उसका अर्थ ठीक-ठीक नहीं लगता। इसलिए 'मम योनिर्महत् ब्रह्म' (गी॰ 14.3) श्लोक में 'ब्रह्म' पद का जो प्रकृति अर्थ है, उसके अनुसार रामानुज-भाष्य में यह अर्थ किया गया है कि इस स्थान पर भी 'ब्रह्म' शब्द से जगत की मूल प्रकृति विवक्षित है; और वही अर्थ हमें भी ठीक मालूम होता है। इसके सिवा महाभारत के शान्तिपर्व में, यज्ञप्रकरण में यह वर्णन है कि 'अनुयज्ञं जगत्सर्वं यज्ञश्चानुजगत्सदा' (शां॰ 236.34) – अर्थात् यज्ञ के पीछे जगत है और जगत के पीछे-पीछे यज्ञ है। ब्रह्म का अर्थ 'प्रकृति' करने से इस वर्णन का भी प्रस्तुत श्लोक से मेल हो जाता है, क्योंकि जगत ही प्रकृति है। गीतारहस्य के सातवें और आठवें प्रकरण में यह बात विस्तारपूर्वक बतलाई गई है, कि परमेश्वर से पहले प्रकृति और त्रिगुणात्मक प्रकृति से जगत के सब कर्म कैसे निष्फल होते है। इसी प्रकार पुरुषसूक्त में भी यह वर्णन है कि देवताओं ने प्रथम यज्ञ करके ही सृष्टि को निर्माण किया है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ३, श्लोक ३.१५