भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ३.१४ ·

English

मूल श्लोक

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः ।यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

annādbhavanti bhūtāni parjanyādannasaṃbhavaḥ yajñādbhavati parjanyo yajñaḥ karmasamudbhavaḥ

३.१४अध्याय ३ · कर्मयोग४३ में से श्लोक १४

अनुवाद

प्राणिमात्र की उत्पत्ति अन्न से होती है, अन्न पर्जन्य से उत्पन्न होता है, पर्जन्य यज्ञ से उत्पन्न होता है और यज्ञ की उत्पत्ति कर्म से होती है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

मनुस्मृति में भी मनुष्य की और उसके धारण के लिए आवश्यक अन्न की उत्पत्ति के विषय में इसी प्रकार का वर्णन है। मनु के श्लोक का भाव यह है - 'यज्ञ की आग में दी हुई आहुति सूर्य को मिलती है और फिर सूर्य से (अर्थात् परम्परा द्वारा यज्ञ से ही) पर्जन्य उपजता है, पर्जन्य से अन्न और अन्न से प्रजा उत्पन्न होती है' (मनु॰ 3.76)। यही श्लोक महाभारत में भी है (देखो मभा॰ शां 282.11)। तैत्तिरीय उपनिषद् (2,1) में यह पूर्वपरम्परा इससे भी पीछे हटा दी गई है और ऐसा क्रम से दिया गया है – ' प्रथम परमात्मा से आकाश हुआ फिर क्रम से वायु, अग्नि , जल और पृथ्वी की उत्पत्ति हुई; पृथ्वी से ओषधि, ओषधि से अन्न, और अन्न से पुरुष उत्पन्न हुआ।' अतएव इस परम्परा के अनुसार, प्राणिमात्र की कर्मपर्यन्त बतलाई गई पूर्वपरम्परा को, अब कर्म के पहले प्रकृति और प्रकृति के पहले ठेठ अक्षर-ब्रह्म पर्यन्त पहुँचाकर पूरी करते हैं –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ३, श्लोक ३.१४