भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ३.१३ ·

English

मूल श्लोक

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yajñaśiṣṭāśinaḥ santo mucyante sarvakilbiṣaiḥ bhuñjate te tvaghaṃ pāpā ye pacantyātmakāraṇāt

३.१३अध्याय ३ · कर्मयोग४३ में से श्लोक १३

अनुवाद

यज्ञ करके शेष बचे हुए भाग को ग्रहण करनेवाले सज्जन सब पापों से मुक्त हो जाते है। परन्तु (यज्ञ न करके केवल) अपने ही लिए जो (अन्न) पकाते हैं, वे पापी लोग पाप भक्षण करते हैं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

ऋग्वेद के 10.117.6 मन्त्र में भी यही अर्थ है। उसमें कहा है कि 'नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी' – अर्थात् जो मनुष्य अर्यमा या सखा का पोषण नहीं करता, अकेला ही भोजन करता है, उसे केवल पापी समझना चाहिए। इसी प्रकार मनुस्मृति में भी कहा है कि 'अघं स केवलं भुङ्क्ते यः पचत्यात्मकारणात्। यज्ञशिष्टाशनं ह्येतत्सतामन्नं विधीयते॥' (3.118) – अर्थात् जो मनुष्य अपने लिए ही (अन्न) पकाता है वह केवल पाप का भक्षण करता है। यज्ञ करने पर जो शेष रह जाता है उसे 'अमृत' और दूसरों को भोजन कर चुकने पर जो शेष रहता है (भुक्तशेष) उसे 'विघस' कहते है (मनु॰ 285)। और, भले मनुष्यों के लिए यही अन्न विहित कहा गया है (देखो गी॰ 4.31)। अब इस बात का और भी स्पष्टीकरण करते हैं कि यज्ञ आदि कर्म न तो केवल तिल और चावलों को आग में झोंकने के लिए ही है और न स्वर्ग-प्राप्ति के लिए ही; वरन् जगत का धारण-पोषण होने के लिए उनकी बहुत आवश्यकता है, अर्थात् यज्ञ पर ही सारा जगत अवलम्बित है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ३, श्लोक ३.१३