मूल श्लोक
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
iṣṭānbhogānhi vo devā dāsyante yajñabhāvitāḥ tairdattānapradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ
अनुवाद
क्योंकि यज्ञ से संतुष्ट होकर देवता लोग तुम्हारे इच्छित (सब) भोग तुम्हें देंगे। उन्हीं का दिया हुआ उन्हें (वापिस) न देकर जो (केवल स्वयं) उपभोग करता है, वह सचमुच चोर है।
टिप्पणी
जब ब्रह्मा ने इस सृष्टि अर्थात् देव आदि सब लोगों को उत्पन्न किया, तब इसे चिन्ता हुई कि इन लोगों का धारण-पोषण कैसे होगा? महाभारत के नारायणीय धर्म में वर्णन है, कि ब्रह्मा ने इसके बाद हजार वर्ष तक तप करके भगवान को सन्तुष्ट किया; तब भगवान ने सब लोगों के निर्वाह के लिए प्रवृत्ति-प्रधान यज्ञ-चक्र उत्पन्न किया और देवता तथा मनुष्य दोनों से कहा, कि इस प्रकार बर्ताव करके एक-दूसरे की रक्षा करो। उक्त श्लोक में इसी कथा का कुछ शब्द-भेद से अनुवाद किया गया है (देखो. मभा॰ शां॰ 390.38 – 62)। इससे यह सिद्धान्त और भी अधिक दृढ़ हो जाता है, कि प्रवृत्ति-प्रधान भागवतधर्म के तत्त्व का ही गीता में प्रतिपादन किया गया है। परन्तु भागवतधर्म में यज्ञों में की जाने वाली हिंसा गर्ह्य मानी गई है (देखो. मभा॰ शां॰ 336 और 337), इसलिए पशुयज्ञ के स्थान में प्रथम द्रव्यमय यज्ञ शुरू हुआ और अन्त में यह मत प्रचलित हो गया कि जपमय यज्ञ अथवा ज्ञानमय यज्ञ ही सब में श्रेष्ठ है (गी॰ 4.23 – 33)। यज्ञ शब्द से मतलब चातुर्वर्ण्य के सब कर्मों से है; और यह बात स्पष्ट है कि समाज का उचित रीति से धारण-पोषण होने के लिए इस यज्ञ-कर्म या यज्ञ-चक्र को अच्छी तरह जारी रखना चाहिए (देखो मनु॰ 1.87) अधिक क्या कहें; यह यज्ञ-चक्र आगे बीसवें श्लोक में वर्णित लोकसंग्रह का ही एक स्वरूप है (देखो गीतार॰ प्र॰ 11)। इसलिए स्मृतियों में भी लिखा है, कि देवलोग और मनुष्यलोग दोनों के संग्रहार्थ भगवान ने ही प्रथम जिस लोकसंग्रहकारक कर्म को निर्माण किया है, उसे आगे अच्छी तरह प्रचलित रखना मनुष्य का कर्तव्य है, और यही अर्थ अब अगले श्लोक में स्पष्ट रीति से बतलाया गया है –
— Lokmanya Tilak