मूल श्लोक
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
tasmādyasya mahābāho nigṛhītāni sarvaśaḥ indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā
अनुवाद
अतएव हे महाबाहु अर्जुन! इन्द्रियों के विषयों से जिसकी इन्द्रियाँ चहुँ ओर से हटी हुई हो, (कहना चाहिए कि ) उसी की बुद्धि स्थिर हुई।
टिप्पणी
सारांश, मन के निग्रह के द्वारा इन्द्रियों का निग्रह करना सब साधनों का मूल है। विषयों में व्यग्र होकर इन्द्रियाँ इधर-उधर दौड़ती रहें तो आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने की (वासनात्मक) बुद्धि ही नहीं हो सकती। अर्थ यह है कि बुद्धि न हो तो उसके विषय में दृढ़ उद्योग भी नहीं होता और फिर शान्ति एवं सुख भी नहीं मिलता। गीतारहस्य के चौथे प्रकरण में दिखलाया है, कि इन्द्रियनिग्रह का यह अर्थ नहीं है, कि इन्द्रियों को एकाएक दबा कर सब कर्मों को बिलकुल छोड़ दे। किन्तु गीता का अभिप्राय यह है कि 64 वे श्लोक में जो वर्णन है, उसके अनुसार निष्काम बुद्धि से कर्म करते रहना चाहिए।
— Lokmanya Tilak