भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.६९ ·

English

मूल श्लोक

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yā niśā sarvabhūtānāṃ tasyāṃ jāgarti saṃyamī yasyāṃ jāgrati bhūtāni sā niśā paśyato muneḥ

२.६९अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ६९

अनुवाद

सब लोगों की जो रात है, उसमें स्थितप्रज्ञ जागता है और जब समस्त प्राणिमात्र जागते रहते है, तब इस ज्ञानवान् पुरुष को रात मालूम होती है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

यह विरोधाभासात्मक वर्णन आलंकारिक है। अज्ञान अन्धकार को और ज्ञान प्रकाश को कहते है (गी॰ 14.11)। अर्थ यह है कि अज्ञानी लोगों को वस्तु अनावश्यक प्रतीत होती है (अर्थात् उन्हें जो अन्धकार है) वही ज्ञानियों को आवश्यक होती है; और जिसमें अज्ञानी लोग उलझे रहते हैं – उन्हें जहाँ उजेला मालूम होता है – वहीं ज्ञानी को अँधेरा देख पड़ता है अर्थात् वह ज्ञानी को अभीष्ट नहीं रहता। उदाहरणार्थ, ज्ञानी पुरुष काम्य कर्मों को तुच्छ मानता है, तो सामान्य लोग उससे लिपटे रहते है, और ज्ञानी पुरुष को जो निष्काम करने चाहिए, उसकी औरों को चाह नहीं होती।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.६९