भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.६० ·

English

मूल श्लोक

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yatato hyapi kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ

२.६०अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ६०

अनुवाद

कारण यह है कि केवल (इन्द्रियों के दमन करने के लिए) प्रयत्न करनेवाले विद्वान के भी मन में, हे कुन्तीपुत्र! ये प्रबल इन्द्रियाँ बलात्कार से मनमानी ओर खींच लेती है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.६०