मूल श्लोक
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ rasavarjaṃ raso'pyasya paraṃ dṛṣṭvā nivartate
अनुवाद
निराहारी पुरुष के विषय छूट जावें, तो भी (उनका) रस अर्थात् चाह नहीं छूटती। परन्तु परब्रह्म का अनुभव होने पर चाह भी छूट जाती है, अर्थात् विषय और उनकी चाह दोनों छूट जाते हैं।
टिप्पणी
अन्न से इन्द्रियों का पोषण होता है। अतएव निराहार या उपवास करने से इन्द्रियाँ अशक्त होकर अपने-अपने विषयों का सेवन करने में असमर्थ हो जाती है। पर इस रीति से विषयोपभोग का छूटना केवल जबर्दस्ती की अशक्तता की बाह्य क्रिया हुई। इससे मन की विषयवासना (रस) कुछ कम नहीं होती, इसलिए यह वासना जिससे नष्ट हो उस ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति करना चाहिए; इस प्रकार ब्रह्म का अनुभव हो जाने पर मन एवं उसके साथ ही साथ इन्द्रियाँ भी आप ही आप ताबे में रहता हैं; इन्द्रियों को ताबे में रखने के लिए निराहार आदि उपाय आवश्यक नहीं – यही इस श्लोक का भावार्थ है। और, यही अर्थ आगे छठे अध्याय के श्लोक में स्पष्टता से वर्णित है (गी॰6.16 -17 और 3.6 – 7 देखो) कि योगी का आहार नियमित रहे, वह आहार-विहार आदि को बिलकुल ही न छोड़ दे। सारांश, गीता का यह सिद्धान्त ध्यान में रखना चाहिए, कि शरीर को कृश करनेवाले निराहार आदि साधन एकांगी हैं अतएव वे त्याज्य है; नियमित आहार-विहार और ब्रह्मज्ञान ही इन्द्रिय-निग्रह का उत्तम साधन है। इस श्लोक में रस शब्द का 'जिह्वा से अनुभव किए जाने वाला मीठा, कडुवा, इत्यादि रस' ऐसा अर्थ करके कुछ लोग यह अर्थ करते है कि उपवासों में शेष इन्द्रियों के विषय यदि छूट भी जाएँ, तो भी जिह्वा का रस अर्थात् खाने-पीने की इच्छा कम न होकर बहुत दिनों के निराहार से और भी अधिक तीव्र हो जाती है। और, भागवत में ऐसे अर्थ का एक श्लोक भी है (भाग॰ 11.8.20)। पर हमारी राय में गीता के इस श्लोक का ऐसा अर्थ करना ठीक नहीं, क्योंकि दूसरे चरण से वह मेल नहीं रखता। इसके अतिरिक्त भागवत में 'रस' शब्द नहीं, 'रसनं' शब्द है, और गीता के श्लोक का दूसरा चरण भी वहाँ नहीं है। अतएव, भागवत और गीता के श्लोक को एकार्थक मान लेना उचित नहीं है। अब आगे के दो श्लोकों में और अधिक स्पष्ट कर बतलाते है, कि बिना ब्रह्मसाक्षात्कार के पूरा-पूरा इन्द्रियनिग्रह हो नहीं सकता है –
— Lokmanya Tilak