भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.६१ ·

English

मूल श्लोक

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

tāni sarvāṇi saṃyamya yukta āsīta matparaḥ vaśe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣṭhitā

२.६१अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ६१

अनुवाद

(अतएव) इन सब इन्द्रियों का संयमन कर युक्त अर्थात् योगयुक्त और मत्परायण होकर रहना चाहिए। इस प्रकार जिसकी इन्द्रियाँ अपने स्वाधीन हो जाएँ (कहना चाहिए कि ) उसकी बुद्धि स्थिर हो गई।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक में कहा है, कि नियमित आहार से इन्द्रियनिग्रह करके साथ ही साथ ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए मत्परायण होना चाहिए, अर्थात् ईश्वर में चित्त लगाना चाहिए; और 59 वें श्लोक का हमने जो अर्थ किया है, उससे प्रकट होगा, कि इसका हेतु क्या है। मनु ने भी निरे इन्द्रियनिग्रह करनेवाले पुरुष को यह इशारा किया है कि 'बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति' (मनु॰ 2.125) और उसी का अनुवाद ऊपर के 60 वें श्लोक में किया है। सारांश, इन तीन श्लोकों का भावार्थ यह कि जिसे स्थितप्रज्ञ होना हो, उसे अपना आहार-विहार नियमित रखकर ब्रह्मज्ञान ही प्राप्त करना चाहिए, ब्रह्मज्ञान होने पर ही मन निर्विषय होता है, शरीर-क्लेश के उपाय तो ऊपरी हैं – सच्चे नहीं। 'मत्परायण' पद से यहाँ भक्तिमार्ग का भी आरम्भ हो गया है (गी॰ 9.34 देखो)। ऊपर के श्लोक में जो 'युक्त' शब्द है, उसका अर्थ 'योग से तैयार या बना हुआ' है। गीता 6.17 में 'युक्त' शब्द का अर्थ 'नियमित' है। पर गीता में इस शब्द का अर्थ है - 'साम्यबुद्धि का जो योग गीता में बतलाया गया है उसका उपयोग करके, तदनुसार समस्त सुख-दुःखों को शान्तिपूर्वक सहन कर, व्यवहार करने में चतुर पुरुष' (गी॰ 5.23 देखो)। इस रीति से निष्णात हुए पुरुष को ही 'स्थितप्रज्ञ' कहते है। उसकी अवस्था ही सिद्धावस्था कहलाती है, और इस अध्याय के तथा पाँचवें एवं बारहवें अध्याय के अन्त में इसी का वर्णन है। यह बतला दिया कि विषयों की चाह छोड़कर स्थितप्रज्ञ होने के लिए क्या आवश्यक है। अब अगले श्लोकों में यह वर्णन करते है, कि विषयों में चाह कैसे उत्पन्न होते है और अन्त में उससे मनुष्य का नाश कैसे हो जाता है, एवं इनसे छुटकारा किस प्रकार मिल सकता है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.६१