भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.५३ ·

English

मूल श्लोक

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

śrutivipratipannā te yadā sthāsyati niścalā samādhāvacalā buddhistadā yogamavāpsyasi

२.५३अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ५३

अनुवाद

(नाना प्रकार के) वेदवाक्यों से घबराई हुई तेरी बुद्धि जब समाधि-वृत्ति में स्थिर और निश्चल होगी, तब (यह साम्यबुद्धिरूप) योग तुझे प्राप्त होगा।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

सारांश, द्वितीय अध्याय के 44 वें श्लोक के अनुसार, जो लोग वेदवाक्य की फलश्रुति में भूले हुए हैं, और जो लोग किसी विशेष फल की प्राप्ति के लिए कुछ कर्म करने की धुन में लगे रहते है, उनकी बुद्धि स्थिर नहीं होती – और भी अधिक गड़बड़ा जाती है। इसलिए अनेक उपदेशों का सुनना छोड़कर चित्त को निश्चल समाधि अवस्था में रख ऐसा करने से साम्यबुद्धिरूप कर्मयोग तुझे प्राप्त होगा और अधिक उपदेश की जरूरत न रहेगी; एवं कर्म करने पर भी तुझे उनका कुछ पाप न लगेगा। इस रीति से जिस कर्मयोगी की बुद्धि या प्रज्ञा स्थिर हो जाएँ, उसे स्थितप्रज्ञ कहते है। अब अर्जुन का प्रश्न है कि उसका व्यवहार कैसा होता है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.५३